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राजसी ठाट-बाट के लिए उम्मेद भवन की करें यात्रा

जोधपुर ,जब आप किसी राजसी किले की ऊंची दीवारों, बुर्ज और उसकी जटिल बनावट से रूबरू होते हैं, उसके झरोखों से बाहर दूर तक झांकते हैं और यह सुनते हैं कि राज्य की आन-बान-शान के लिए यहां के सैनिक दुश्मन सैनिकों से लड़ते हुए अपनी जान की कुर्बानी देने में जरा भी नहीं हिचके, तो आप निश्चित रूप से अपनी उस विरासत से मुलाकात करते हैं जो इतिहास के पन्नों में आज भी गर्व से जीवित है। इसके अलावा, जब आपको राजा-महाराजाओं के महल में उनके समय के जैसे ठाठ-बाट के साथ लगभग उसी माहौल में रहने का अवसर मिलता है, तो एकबारगी आपको ऐसा लग सकता है जैसे आप खुद वहां के महाराजा या फिर राजपरिवार के सदस्य हों। यह एहसास आपके लिए ताउम्र न भूलने वाला हो सकता है। और अगर मन में कहीं उनकी शानो-शौकत को महसूस करने की इच्छा है, तो महलों में रात गुजारिए। भले ही अब राजा-महाराजा और उनकी शानो-शौकत बरकरार न हो, लेकिन उनके रुतबे और शाही ठाट-बाट का अनुभव आज के समय में आप भी किलों और महलों में जाकर काफी हद तक हासिल कर सकते हैं।दरअसल, राजसी गौरव के प्रतीक कई किले और महल आज लक्जरी होटलों में तब्दील हो चुके हैं, जहां आधुनिक युग की तमाम सुख-सुविधाओं के साथ हेरिटेज फील को भी काफी हद तक संजोया गया है। पर्यटन के लिहाज से इन किलों और महलों की सैर काफी रोमांचकारी साबित हो सकती है। यहां पर रुकना एक राजसी एहसास और इतिहास के उन पलों में लौटने जैसा है।
वैभव का गवाह उम्मेद भवन
शाही समृद्ध विरासत और संस्कृति के धनी राजस्थान में राजसी महलों की शान अद्भुत है। जोधपुर का शाही महल उम्मेद भवन पैलेस हर राजसी परंपरा से आपका परिचय कराता है। इसके मालिक हैं महाराजा गज सिंह। उनके पिता महाराजा उम्मेद सिंह ने इसे बनवाया था। इसके संग्रहालय में राजसी हवाई जहाज के मॉडलों, हथियारों, प्राचीन वस्तुओं, घडि़यों, बॉब घडि़यों, बर्तनों, कटलरी, तस्वीरों और शिकार की ट्रॉफियां तक संजोयी गई हैं। आज यह महल बड़े बिजनेस घरानों की शाही शादियों और बॉलीवुड फिल्मों के लिए रॉयल डेस्टिनेशन है।
कहते हैं कि मारवाड़ में पड़े भीषण अकाल के दौरान साल 1929 में महाराजा उम्मेद सिंह ने इसका निर्माण शुरू कराया था। इसका डिजाइन ब्रिटेन के हैनरी लैंचेस्टर ने करीब पांच साल में तैयार किया था। उम्मेद भवन साल 1943 में बनकर तैयार हो गया था। इसमें कुल 347 कमरे और हॉल हैं। आजादी के बाद वर्ष 1978 में इसे होटल में बदल दिया गया। हालांकि आज भी इसके एक भाग में पूर्व नरेश का परिवार रहता है। जोधपुर के प्रसिद्ध चित्तर पत्थर से बना होने के कारण स्थानीय लोग इसे चित्तर पैलेस के नाम से भी जानते हैं। महल को तराशे गए बलुआ पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। मजे की बात यह है कि पत्थरों को बांधने के लिए किसी मसाले का उपयोग नहीं किया गया।
कैसे पहुंचे
उम्मेद भवन पैलेस जोधपुर रेलवे स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर और मेहरान गढ़ किले से छह किलोमीटर की दूरी पर है।

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