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क्या भारत पर फिर टैरिफ का हंटर चलाएंगे डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिकी ‘सेक्शन 301’ की ब्लैक लिस्टेड रिपोर्ट में आया भारत का नाम

भारत और अमेरिका के बीच वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर चल रही व्यापार समझौते (Trade Agreement) की हाई-प्रोफाइल बातचीत के बीच वाशिंगटन से एक बेहद परेशान करने वाली और चौंकाने वाली अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आ रही है। अमेरिका की शीर्ष व्यापारिक संस्था यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के ऑफिस ने अपनी ताजातरीन रिपोर्ट में भारत को दुनिया की उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर लिया है जो उनके मुताबिक 'गलत और अनुचित व्यापार तरीके' अपनाते हैं। इस बेहद तल्ख और विवादित आकलन के आधार पर अमेरिकी ट्रेड एजेंसी ने प्रभावित देशों से अमेरिका आने वाले विभिन्न सामानों और आयातों पर सीधे 10% से लेकर 12.5% तक का भारी-भरकम अतिरिक्त टैरिफ (Customs Duty) लगाने का एक बहुत बड़ा प्रस्ताव अमेरिकी प्रशासन के सामने पेश कर दिया है। इस कदम से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर एक बार फिर से कड़े व्यापारिक प्रतिबंध और ऊंचे कर लगाने की अटकलें बेहद तेज हो गई हैं। जबरदस्ती मजदूरी और कथित श्रम नियमों को लेकर 54 देशों के साथ भारत पर भी दागे गंभीर सवाल अमेरिकी ट्रेड एजेंसी USTR ने अमेरिकी कानून के प्रसिद्ध 'सेक्शन 301' के तहत दुनिया भर के व्यापारिक तौर-तरीकों की गहनता से की गई करीब 60 जांचों के सनसनीखेज नतीजे आधिकारिक तौर पर जारी किए हैं। इस अमेरिकी सूची में भारत को दुनिया की उन 54 चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में ब्लैकलिस्ट या पहचाना गया है, जिनके पास अमेरिकी सरकार के आकलन के अनुसार 'जबरदस्ती मजदूरी' (Forced Labor) का इस्तेमाल करके कथित तौर पर तैयार किए गए माल और कच्चे माल के आयात को रोकने या उसे प्रभावी ढंग से प्रतिबंधित करने के लिए अपने देश में पर्याप्त कानूनी उपाय और सुरक्षा तंत्र मौजूद नहीं हैं। टेक्सटाइल और कपड़ों के व्यापार के लिए अलग कोटे का सुझाव, व्यापारिक कार्रवाई की खुली चेतावनी इस व्यापक रिपोर्ट में USTR ने भारत के सबसे मजबूत निर्यात क्षेत्र यानी टेक्सटाइल और रेडीमेड कपड़ों के इंटरनेशनल बिजनेस के लिए एक बिल्कुल अलग और विशेष व्यवस्था बनाने का भी अहम सुझाव दिया है। इस नई प्रस्तावित नीति के तहत दुनिया की चुनिंदा चिन्हित अर्थव्यवस्थाओं से केवल एक निश्चित और तय मात्रा (Quota) में ही टेक्सटाइल उत्पादों को अमेरिकी बाजारों में कम 'सेक्शन 301' टैरिफ दर पर प्रवेश करने की रियायत दी जाएगी, जबकि सीमा से अधिक होने वाले आयात पर भारी जुर्माना और टैक्स वसूला जाएगा। अमेरिकी एजेंसी ने साफ और कड़े शब्दों में संकेत दिया है कि वह इन जांचों के आए नतीजों के आधार पर बहुत जल्द भारत सहित सभी चिन्हित देशों के खिलाफ उचित और कड़ी दंडात्मक व्यापारिक कार्रवाई शुरू करने का पूरा इरादा रखती है। हमारे सबसे खास व्यापारिक साझेदारों का यह रवैया बिल्कुल अस्वीकार्य: अमेरिकी राजदूत जेमिसन ग्रीर इस कूटनीतिक और आर्थिक विवाद पर अमेरिका के शीर्ष राजनयिक और राजदूत जेमिसन ग्रीर ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार करते हुए एक बड़ा बयान जारी किया है। राजदूत ग्रीर ने खुले तौर पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वैश्विक मंच पर हमारे सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक व्यापारिक साझेदारों का जबरदस्ती कराए गए श्रम और बंधुआ मजदूरी से बने सामानों के आयात से जुड़े इस गंभीर मुद्दे को हल करने में नाकाम रहना पूरी तरह से असहनीय और अस्वीकार्य है। उन्होंने अमेरिकी उद्योगपतियों का पक्ष लेते हुए कहा कि विदेशी सरकारों की इस लापरवाही से एक ऐसी विषम स्थिति पैदा होती है, जहां अमेरिकी घरेलू कामगारों और फैक्ट्रियों को वैश्विक स्तर पर एक बेहद असमान और अनुचित मैदान पर विदेशी सामानों से मुकाबला करने के लिए लाचार होना पड़ता है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचता है। पूरी दुनिया की 60 बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आई अमेरिका के निशाने पर, यूरोप से लेकर एशिया तक मची खलबली USTR के ताजा आंकड़ों और दावों के मुताबिक, दुनिया की करीब 60 ऐसी बड़ी और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं हैं जो जबरदस्ती मजदूरी से तैयार किए गए विवादित सामानों के आयात-निर्यात पर रोक लगाने और स्थानीय श्रम कानूनों को कड़ाई से अपने यहां लागू करने में पूरी तरह विफल साबित हुई हैं। अमेरिका द्वारा जारी की गई इस विस्तृत वैश्विक सूची में भारत और चीन जैसे बड़े देशों के अलावा अल्जीरिया, अंगोला, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बहामास, बहरीन, बांग्लादेश, ब्राजील, कंबोडिया, चिली, कोलंबिया, कोस्टा रिका, डोमिनिकन रिपब्लिक, मिस्र, अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला, गुयाना, होंडुरास, हांगकांग, इराक, इजरायल, जापान, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कुवैत, लीबिया, मलेशिया, मोरक्को, न्यूजीलैंड, निकारागुआ, नाइजीरिया, नॉर्वे, ओमान, पेरू, फिलीपींस, कतर, रूस, सऊदी अरब, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, स्विट्जरलैंड, ताइवान, थाईलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), यूनाइटेड किंगडम (UK), उरुग्वे, वेनेज़ुएला, कनाडा, इक्वाडोर, यूरोपीय संघ (EU), इंडोनेशिया, मेक्सिको, पाकिस्तान और वियतनाम जैसे तमाम देशों के नाम शामिल हैं, जिससे पूरी दुनिया के ग्लोबल ट्रेड मार्केट में भारी खलबली मच गई है। जानिए आखिर क्या है यह खतरनाक 'धारा 301' और इसके तहत अमेरिकी प्रशासन को क्या मिलते हैं अधिकार अंतरराष्ट्रीय व्यापार को समझने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, धारा 301 (Section 301) वास्तव में अमेरिकी ट्रेड एक्ट 1974 (US Trade Act 1974) का एक बेहद शक्तिशाली और ऐतिहासिक कानूनी प्रावधान है। यह कानून यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) को यह असीमित अधिकार देता है कि वह किसी भी विदेशी सरकार की उन सभी व्यापारिक नीतियों, तरीकों, सब्सिडी और घरेलू कार्यों की एकतरफा जांच कर सके जो अमेरिकी हितों को प्रभावित करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि क्या किसी दूसरे देश द्वारा उठाए गए आर्थिक कदम या नीतियां अमेरिकी कंपनियों के लिए अनुचित, भेदभावपूर्ण हैं या फिर वे अमेरिका के वाणिज्यिक और कारोबारी हितों पर कोई बेवजह का वित्तीय बोझ या नुकसान तो नहीं डाल रहे हैं। अगर USTR की जांच में यह निष्कर्ष निकल आता है कि किसी देश ने ऐसे तरीके अपनाए हैं जो अमेरिकी वाणिज्य के लिए बेहद नुकसानदेह हैं, तो यह कड़ा कानून अमेरिकी प्रशासन और राष्ट्रपति को उस देश के खिलाफ सुधारात्मक और दंडात्मक कार्रवाई करने का पूर्ण विधिक अधिकार सौंप देता है। इन दंडात्मक उपायों के तहत संबंधित देशों के उत्पादों पर अचानक भारी सीमा शुल्क (टैरिफ) थोपना, उनके व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लगाना या अमेरिकी बाजारों में उनकी एंट्री बैन करने जैसे कई कड़े कदम शामिल हो सकते हैं।