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खामेनेई युग का अंत: 36 साल तक ईरान पर राज करने वाले अयातुल्ला की मौत से दहला मिडिल ईस्ट, जानें एक हाथ बेकार होने से ‘सुप्रीम लीडर’ बनने तक की कहानी

तेहरान/वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया (West Asia) की राजनीति में एक युग का अंत हो गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, अमेरिका और इजरायल के एक भीषण हवाई हमले में मारे गए हैं। इस खबर ने न केवल खाड़ी देशों में युद्ध के बादल गहरे कर दिए हैं, बल्कि दुनिया भर में प्रदर्शनों का दौर शुरू कर दिया है। 36 वर्षों तक ईरान की सत्ता को अपनी मुट्ठी में रखने वाले खामेनेई अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हैं। उनके निधन के साथ ही उस विवादित और कठोर शासन पर बहस छिड़ गई है, जिसने आधुनिक ईरान की दिशा तय की थी।जब ‘टेप रिकॉर्डर’ बम से हुआ था जानलेवा हमलाखामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने का सफर कांटों भरा रहा। साल 1981 में, जब वे ईरान के राष्ट्रपति थे, उन पर एक भीषण आत्मघाती हमला हुआ था। नमाज के बाद वे जनता के सवालों का जवाब दे रहे थे, तभी ‘फुरकान ग्रुप’ के एक हमलावर ने उनकी डेस्क पर बम से लैस टेप रिकॉर्डर रख दिया। धमाका इतना जबरदस्त था कि खामेनेई कई महीनों तक अस्पताल में रहे।इस हमले ने उन्हें जीवन भर का जख्म दिया—उनका दाहिना हाथ हमेशा के लिए बेकार (लकवाग्रस्त) हो गया। यही वजह थी कि वे सार्वजनिक मंचों पर केवल अपना बायां हाथ उठाकर ही अभिवादन करते या शपथ लेते थे। उन्होंने तब कहा था, “अगर मेरा दिमाग और जुबान काम करती है, तो मुझे एक हाथ की जरूरत नहीं है।”मदरसे से ‘खोमैनीवाद’ के ध्वजवाहक तक1939 में मशहद में जन्मे खामेनेई ने बचपन से ही इस्लामी मदरसों में कट्टरपंथी और क्रांतिकारी शिक्षा प्राप्त की थी। 1958 में उनकी मुलाकात अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी से हुई, जिन्हें वे अपना गुरु मान बैठे। उन्होंने ‘विलायत-ए-फकीह’ (धर्मगुरु की संरक्षकता) के सिद्धांत को अपनाया, जिसका अर्थ था कि देश की कमान एक सर्वोच्च शिया विद्वान के हाथ में होनी चाहिए। शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन के खिलाफ उन्होंने दो दशक तक संघर्ष किया, जेल गए और यातनाएं सहीं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद जब शाह का पतन हुआ, तब खामेनेई सत्ता के केंद्र में आए।विवादों के बीच ‘सुप्रीम लीडर’ का चुनाव1989 में जब अयातुल्ला खोमैनी की मृत्यु हुई, तो उत्तराधिकारी को लेकर काफी घमासान हुआ। खामेनेई के पास ‘ग्रैंड अयातुल्ला’ का धार्मिक दर्जा नहीं था, जो उस समय सर्वोच्च नेता बनने के लिए अनिवार्य था। लेकिन अपनी राजनीतिक पकड़ और खोमैनी के प्रति वफादारी के चलते उन्होंने संविधान में संशोधन करवाया और रातों-रात ‘अयातुल्ला’ का दर्जा पाकर ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गए।लोहे की मुट्ठी से चलाया शासन: IRGC और आंतरिक दमनखामेनेई ने अपने शासनकाल में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) को इतना शक्तिशाली बना दिया कि वह ईरान की सेना से भी ऊपर हो गई। उन्होंने न केवल बाहरी दुश्मनों (अमेरिका और इजरायल) से लोहा लिया, बल्कि आंतरिक विद्रोहों को भी बेरहमी से कुचला। हाल ही में दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच हुए जनआंदोलनों को उनकी सरकार ने बेहद कठोरता से दबाया, जिसमें हजारों प्रदर्शनकारियों की जान गई। आज उनकी मौत के बाद जहां एक वर्ग मातम मना रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे एक ‘तानाशाही’ के अंत के रूप में देख रहा है।