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₹2000 से ज्यादा के UPI पेमेंट पर मर्चेंट चार्ज क्यों, सुप्रीम कोर्ट के तीखे सवाल पर केंद्र ने दिया बड़ा जवाब

देशभर में करोड़ों नागरिकों और व्यापारियों की दैनिक जीवनशैली का अहम हिस्सा बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई (UPI) को लेकर एक बड़ा कानूनी और नीतिगत विवाद देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने ₹2000 से अधिक राशि के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के हालिया फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को औपचारिक नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल कर जवाब मांगा है।

जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने इस मामले की गहन सुनवाई की। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से इस नए प्रस्तावित शुल्क ढांचे के क्रियान्वयन पर तत्काल प्रभाव से अंतरिम रोक (Stay) लगाने की पुरजोर मांग की गई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने इस प्रारंभिक चरण में किसी भी प्रकार का स्टे ऑर्डर देने से साफ इनकार कर दिया। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार और संबंधित वित्तीय संस्थाओं द्वारा तय की गई नीतिगत प्रक्रिया फिलहाल सुचारू रूप से आगे बढ़ सकेगी।

गजट नोटिफिकेशन और प्रस्तावित MDR फ्रेमवर्क को क्यों दी गई है चुनौती

सर्वोच्च न्यायालय में यह याचिका अधिवक्ता आशुतोष दुबे के माध्यम से याचिकाकर्ता वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर की गई है। इस याचिका में मुख्य रूप से केंद्र सरकार द्वारा 14 सितंबर 2026 को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A के तहत जारी किए गए आधिकारिक गजट नोटिफिकेशन को असंवैधानिक और मनमाना बताते हुए चुनौती दी गई है। इसके साथ ही याचिका में 15 सितंबर को घोषित उस विस्तृत नीतिगत फ्रेमवर्क को भी निरस्त करने की मांग की गई है, जिसके जरिए ₹2000 से अधिक मूल्य के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत तक मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का प्रावधान किया गया है।

प्रस्तावित नियमों के तहत ₹75,000 और उससे अधिक राशि के बड़े वाणिज्यिक लेन-देन के लिए अधिकतम शुल्क (कैप) ₹300 तय किया गया है, जबकि विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों और आवश्यक सेवाओं के लिए अलग-अलग रियायती दरें निर्धारित की गई हैं। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में जोरदार दलील देते हुए कहा कि यदि डिजिटल भुगतान पर इस तरह के अप्रत्यक्ष शुल्क लगाए जाएंगे, तो इससे डिजिटल इंडिया मिशन को गहरा झटका लगेगा, नकद लेन-देन को दोबारा बढ़ावा मिलेगा और बाजार में कर अपवंचन व भ्रष्टाचार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में जवाब: 'यह जबरन वसूली नहीं, 96% लेन-देन रहेंगे पूरी तरह फ्री'

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमन ने सरकार के इस नीतिगत कदम का पुरजोर बचाव किया। एएसजी ने अदालत के समक्ष स्पष्ट और तथ्यात्मक दलील रखते हुए कहा कि यह कोई जबरन की गई वसूली या सरकारी टैक्स नहीं है। उन्होंने खंडपीठ को समझाया कि यह प्रस्तावित शुल्क वस्तुतः बैंकों, तकनीकी सर्विस प्रोवाइडर्स और पेमेंट एग्रीगेटर्स के बीच बुनियादी तकनीकी ढांचे को संचालित रखने के लिए तय की गई एक बेहद मामूली सेटलमेंट फीस है, जिसमें से भारत सरकार के खजाने में एक भी रुपया नहीं जाता है।

केंद्र सरकार के विधि अधिकारी ने यह भी रेखांकित किया कि देश में होने वाले कुल यूपीआई ट्रांजैक्शन में से 96 प्रतिशत से अधिक लेन-देन इस नए नियम के दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे। उन्होंने कहा कि दूध, दवाई, राशन और अन्य अत्यंत आवश्यक नागरिक सेवाओं के लिए इस शुल्क की ऊपरी सीमा मात्र ₹5 तय की गई है। एएसजी ने जोर देकर कहा कि बैंकों को लाखों-करोड़ों डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के लिए भारी-भरकम सर्वर क्षमता, क्लाउड स्पेस और तकनीकी संसाधनों पर लगातार खर्च करना पड़ता है। क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के लेन-देन पर पहले से ही एमडीआर लागू है, जबकि यूपीआई को अब तक पूरी तरह शून्य शुल्क पर संचालित किया जा रहा था, जिससे बैंकिंग तंत्र पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ रहा था।

आम जनता पर कोई असर नहीं: P2P ट्रांजैक्शन और छोटे दुकानदार रहेंगे शत-प्रतिशत मुक्त

इस पूरे कानूनी विवाद और अदालती प्रक्रिया के बीच केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने देश के आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों की चिंताओं को पूरी तरह दूर करते हुए स्थिति स्पष्ट की है। सरकार ने दोहराया है कि आम उपभोक्ताओं के लिए यूपीआई भुगतान पहले की तरह ही पूरी तरह निःशुल्क रहेगा। ग्राहक चाहे ₹10 का भुगतान करें या ₹50,000 का, उनसे किसी भी प्रकार का कोई अतिरिक्त पैसा या सरचार्ज नहीं वसूला जाएगा। इसके साथ ही, व्यक्ति-से-व्यक्ति (Person-to-Person यानी P2P) के बीच होने वाले सभी वित्तीय ट्रांसफर, चाहे रकम कितनी भी बड़ी क्यों न हो, हमेशा की तरह पूरी तरह मुफ्त बने रहेंगे।

वित्त मंत्रालय ने छोटे कारोबारियों और रेहड़ी-पटरी वालों के हितों की रक्षा का ब्योरा देते हुए बताया कि यूपीआई क्यूआर (QR) कोड के जरिए महीने में ₹1 लाख तक का डिजिटल व्यापार करने वाले छोटे व्यापारियों पर शून्य शुल्क का नियम लागू रहेगा। इसके अतिरिक्त, ₹2000 से कम राशि के 95 प्रतिशत से अधिक दैनिक मर्चेंट भुगतान पूरी तरह से निःशुल्क रहेंगे। शुल्क का यह नया ढांचा केवल बड़े कॉरपोरेट मर्चेंट्स, संगठित रिटेल चेन्स और उच्च मूल्य वाले व्यावसायिक लेन-देन पर ही लागू होगा।

15 अक्टूबर से लागू होगा नया नियम: डिजिटल ढांचे की मजबूती के लिए आरबीआई का समर्थन

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी इस नीतिगत पहल का मजबूती से समर्थन किया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी), साइबर सुरक्षा मानकों को अत्याधुनिक बनाने और टियर-III से टियर-VI शहरों तथा ग्रामीण भारत में डिजिटल वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के लिए हाई-वैल्यू ट्रांजैक्शन पर मामूली एमडीआर लगाना समय की मांग है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और एएसजी की प्रारंभिक दलीलों को रिकॉर्ड पर लेते हुए निर्देश दिया है कि केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक एक व्यापक हलफनामा पेश कर इस व्यवस्था के सभी तकनीकी, आर्थिक और सुरक्षात्मक पहलुओं का विवरण अदालत के सामने रखें। इस मामले की अगली विस्तृत सुनवाई अब चार सप्ताह बाद नियत की गई है। तब तक 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस नए वित्तीय फ्रेमवर्क पर कोई रोक नहीं होगी, जिससे वित्तीय संस्थानों को अपनी तकनीकी प्रणालियों को सुचारू रूप से तैयार करने का अवसर मिलेगा।