
पाकिस्तान की सत्ता संरचना और राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराता नजर आ रहा है। देश की कमजोर आर्थिक स्थिति, राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन सरकार की लाचारी के बीच पाकिस्तान के थल सेना प्रमुख (COAS) जनरल सैयद आसिम मुनीर (General Asim Munir) देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति और अघोषित 'सुपर बॉस' बनकर उभरे हैं। संसद और सरकार द्वारा पारित किए गए नए विधायी संशोधनों और रक्षा पुनर्गठन के जरिए जनरल मुनीर के हाथों में न केवल थल सेना, बल्कि नौसेना और वायु सेना समेत समूचे राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की कमान सौंप दी गई है। पर्दे के पीछे से शासन चलाने वाली रावलपिंडी की सैन्य कमान अब पूरी तरह कानूनी और संवैधानिक आड़ लेकर फ्रंटफुट पर आ चुकी है, जिससे पाकिस्तान में लोकतंत्र केवल नाम का रह गया है और सेनापति का पूर्ण एकाधिकार स्थापित हो चुका है।
सेना अधिनियम में संशोधन: तीनों सेनाओं पर पूर्ण नियंत्रण और 5 साल का कार्यकाल
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली और सीनेट में भारी हंगामे और आनन-फानन के बीच 'पाकिस्तान आर्मी एक्ट' (Pakistan Army Act) और रक्षा सेवा कानूनों में बड़े संशोधनों को मंजूरी दी गई है:
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कार्यकाल 3 से बढ़ाकर 5 वर्ष: नए कानून के तहत थल सेना, नौसेना और वायु सेना प्रमुखों के कार्यकाल को 3 साल से बढ़ाकर सीधे 5 साल कर दिया गया है। इससे जनरल आसिम मुनीर का शीर्ष पद पर प्रभाव लंबे समय के लिए सुरक्षित और निर्विवाद हो गया है।
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चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी पर सेना प्रमुख का दबदबा: नए प्रशासनिक ढांचे के तहत सेना प्रमुख को राष्ट्रीय रक्षा रणनीतियों, विदेशी सुरक्षा समझौतों और तीनों सेनाओं के संयुक्त अभियानों में वीटो और अंतिम निर्णय लेने का असीमित अधिकार दे दिया गया है।
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सैन्य अदालतों (Military Courts) का दायरा: असैन्य नागरिकों (Civilian Protesters) और राजनीतिक विरोधियों पर सैन्य अदालतों में मुकदमा चलाने की व्यवस्था को और सख्त बना दिया गया है, जिससे सेना के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कानूनी तौर पर कुचला जा सके।
विशेष निवेश सुविधा परिषद (SIFC): अर्थव्यवस्था पर भी सैन्य पहरा
जनरल आसिम मुनीर का प्रभाव केवल रक्षा और सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि देश के आर्थिक फैसलों पर भी सेना ने सीधा कब्जा कर लिया है। 'स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल' (SIFC) की स्थापना के बाद से:
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खनिज, कृषि और ऊर्जा सौदों की कमान: खाड़ी देशों (सऊदी अरब, यूएई, कतर) और चीन के साथ होने वाले सभी बड़े निवेश समझौतों, सरकारी उपक्रमों के निजीकरण और बहुमूल्य खनिज (Mining) प्रोजेक्ट्स पर अंतिम मुहर जनरल मुनीर और उनके शीर्ष जनरलों द्वारा ही लगाई जा रही है।
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नागरिक कैबिनेट की लाचारी: प्रधानमंत्री और संघीय कैबिनेट के मंत्री अब एसआईएफसी की बैठकों में सैन्य अधिकारियों के सामने केवल कागजी भूमिका निभाते नजर आते हैं। विदेशी निवेशक भी नागरिक सरकार के बजाय सीधे सैन्य नेतृत्व के साथ समझौतों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
न्यायपालिका और खुफिया तंत्र पर सख्त शिकंजा
संसद से पारित नए न्यायिक सुधारों और संशोधनों के जरिए पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका और हाई कोर्ट्स के अधिकार क्षेत्र को भी काफी हद तक सीमित कर दिया गया है:
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संवैधानिक पीठों का गठन: न्यायपालिका में वरिष्ठतम जजों की स्वतंत्रता को निष्प्रभावी करने के लिए अलग से 'संवैधानिक पीठ' (Constitutional Benches) बनाई गई हैं, जिनकी नियुक्ति में सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान का दखल बढ़ गया है।
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आईएसआई और सुरक्षा एजेंसियों को खुली छूट: देश की शक्तिशाली खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) को फोन टैपिंग, डिजिटल निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी भी नागरिक व नेता के संचार को ट्रैक करने की पूर्ण कानूनी वैधता प्रदान कर दी गई है।
कमजोर नागरिक सरकार और विपक्ष का दमन
पाकिस्तान में वर्तमान शहबाज शरीफ सरकार का अस्तित्व पूरी तरह सैन्य समर्थन (Establishment's Grace) पर टिका हुआ है।
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पीटीआई और इमरान खान पर लगाम: देश के सबसे बड़े विपक्षी दल पीटीआई और जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को चुनावी राजनीति और मुख्यधारा से बाहर रखने के लिए हर संभव कानूनी और प्रशासनिक हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
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मीडिया और सोशल मीडिया पर सेंसरशिप: इंटरनेट पर 'वर्चुअल फायरवॉल' और डिजिटल मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगाकर किसी भी प्रकार के सैन्य-विरोधी नैरेटिव को दबाया जा रहा है। पत्रकारों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की घटनाएं आम हो चुकी हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंता
पाकिस्तान में जनरल आसिम मुनीर का 'सुपर बॉस' के रूप में उभरना भारत समेत दक्षिण एशियाई क्षेत्र और पश्चिमी देशों के लिए नई भू-राजनीतिक चुनौतियां लेकर आया है। जब सेना पूरी तरह अनियंत्रित हो जाती है, तो वह घरेलू असंतोष और विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए सीमाओं पर तनाव बढ़ाने या आक्रामक बयानबाजी का सहारा लेती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और वैश्विक वित्तीय संस्थाएं भी पाकिस्तान में लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने और सैन्य तानाशाही जैसी व्यवस्था बनने को लेकर लगातार सवाल उठा रही हैं।
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