
पड़ोसी देशों के बीच कूटनीति और कड़वाहट का दौर कोई नया नहीं है, लेकिन इस समय अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रहा तनाव एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। अफगानिस्तान में सत्तासीन तालिबान शासन ने पाकिस्तान की सेना और उसके शीर्ष नेतृत्व पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। तालिबान के आधिकारिक प्रवक्ताओं और वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और वहां की हुकूमत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए 'मक्का पैक्ट' यानी शांति समझौतों और इस्लामिक देशों के बीच बनी सहमति से पीछे हटने के लिए लगातार बहाने तलाश रही है। अपने इसी नापाक एजेंडे को पूरा करने और देश की जनता का ध्यान अपनी आंतरिक राजनीतिक व आर्थिक बदहाली से भटकाने के लिए पाकिस्तानी फौज जानबूझकर अफगान सीमा पर सैन्य हमले कर रही है और दोनों देशों के बीच तनाव को हवा दे रही है।
मक्का पैक्ट और इस्लामिक दुनिया के समझौतों से पीछे भाग रहा पाकिस्तान
जानकारों के अनुसार, सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में दोनों देशों के बीच आपसी तनाव को कम करने और सीमावर्ती इलाकों में शांति स्थापित करने के लिए कुछ अहम धार्मिक और कूटनीतिक समझौतों पर सहमति बनी थी, जिसे मक्का पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना और दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच आपसी विश्वास को बहाल करना था। हालांकि, पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) कभी भी क्षेत्र में वास्तविक शांति नहीं चाहती क्योंकि वहां की सत्ता का एक बड़ा हिस्सा भारत और अफगानिस्तान विरोधी एजेंडे के बल पर ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेकता है। तालिबान का आरोप है कि जैसे ही पाकिस्तान पर मक्का समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का दबाव बढ़ा, वैसे ही पाकिस्तानी सेना ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ने के लिए सीमा पार से अकारण गोलीबारी और हवाई हमले शुरू कर दिए ताकि इस शांति प्रक्रिया को पूरी तरह से पटरी से उतारा जा सके।
पाकिस्तान की आंतरिक कलह और सैन्य नेतृत्व की रणनीतिक विफलताएं
मौजूदा समय में पाकिस्तान जिस गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, उससे दुनिया का कोई भी कोना अछूता नहीं है। देश के भीतर महंगाई आसमान छू रही है, पाकिस्तानी रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में बगावत के सुर तेज होते जा रहे हैं। अपनी इन्हीं घरेलू असफलताओं को छिपाने के लिए पाकिस्तानी सेना हमेशा से एक बाहरी दुश्मन की तलाश करती रही है। तालिबान ने जनरल असीम मुनीर की नीतियों की पोल खोलते हुए कहा है कि पाकिस्तानी फौज अपनी विफलताओं का ठीकरा हमेशा अफगान तालिबान के सिर फोड़ने की कोशिश करती है। जब भी पाकिस्तान की जनता अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़कों पर उतरती है, तो सेना सीमा पर तनाव बढ़ाकर युद्ध जैसे हालात पैदा कर देती है ताकि राष्ट्रवाद के नाम पर जनता का ध्यान भटकाया जा सके और फौजी शासन का दबदबा कायम रखा जा सके।
अफगान सीमा पर बढ़ते संघर्ष और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए मंडराता खतरा
पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा यानी डूरंड लाइन के आसपास के इलाकों में पिछले कुछ महीनों से लगातार हिंसक झड़पें देखने को मिल रही हैं। पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों द्वारा अफगान सीमा के भीतर की जाने वाली बमबारी में कई निर्दोष नागरिकों और बच्चों की जान जा चुकी है, जिससे अफगान नागरिकों के मन में पाकिस्तान के प्रति भारी गुस्सा और नफरत भर चुकी है। तालिबान प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर यदि दोबारा कोई आंच आई, तो इसका माकूल और कड़ा जवाब दिया जाएगा। इस तरह के सैन्य संघर्षों से न केवल दक्षिण एशिया की शांति खतरे में पड़ रही है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों आम इंसानों का जीवन भी नर्क बन चुका है, जिन्हें हर वक्त गोलियों और बमों की आवाज़ के बीच जीने को मजबूर होना पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक ताकतों की चुप्पी पर उठते बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य प्रमुख वैश्विक ताकतें इस क्षेत्रीय तनाव पर अभी तक अपेक्षित और सख्त रुख अपनाने से बचती नजर आ रही हैं। आतंकवाद के प्रायोजक के रूप में बदनाम हो चुका पाकिस्तान खुद को पीड़ित बताकर दुनिया की सहानुभूति हासिल करने की पुरानी चाल चल रहा है, लेकिन अब तालिबान के इन तीखे और बेबाक खुलासों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान का असली चेहरा बेनकाब हो चुका है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वैश्विक संगठनों ने पाकिस्तान की इन सैन्य हरकतों पर लगाम नहीं लगाई, तो यह विवाद एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिससे पूरे मध्य एशिया और दक्षिण एशिया की स्थिरता दांव पर लग सकती है। पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि जबरन हमले करने और समझौतों से भागने से उसकी आंतरिक समस्याएं हल नहीं होने वाली हैं, बल्कि इससे उसका वैश्विक स्तर पर और अधिक पतन तय है।
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