
उत्तर-पूर्व भारत के सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों से जुड़ी एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां केंद्र सरकार ने अशांत क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम यानी AFSPA (Armed Forces Special Powers Act) की अवधि को आगामी छह महीने के लिए और अधिक बढ़ा दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, यह विस्तार मुख्य रूप से मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के चुनिंदा संवेदनशील और अशांत जिलों या पुलिस थाना क्षेत्रों में लागू रहेगा। पिछले कुछ समय से उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में जारी जातीय तनाव, स्थानीय उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए यह कड़ा और रणनीतिक कदम उठाया गया है। सरकार का यह निर्णय इस बात को स्पष्ट करता है कि केंद्र सरकार सीमावर्ती राज्यों में स्थायी शांति, राष्ट्रीय सुरक्षा और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किसी भी प्रकार की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है, और सुरक्षा बलों को आवश्यक कानूनी सुरक्षा व विशेषाधिकार देना जारी रखा जाएगा।
पूर्वोत्तर के इन राज्यों में AFSPA का इतिहास दशकों पुराना है, और इस कानून के तहत सुरक्षा बलों (सेना और असम राइफल) को अशांत क्षेत्रों में आतंकवादियों, उग्रवादियों और देशविरोधी तत्वों के खिलाफ तलाशी अभियान चलाने, बिना वारंट के गिरफ्तारी करने और जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग करने के विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार की निरंतर शांति वार्ताओं, आत्मसमर्पण अभियानों और विकासोन्मुखी नीतियों के कारण पूर्वोत्तर के कई हिस्सों से इस कानून को धीरे-धीरे पूरी तरह या आंशिक रूप से हटाया भी गया है। लेकिन वर्तमान में मणिपुर के कुछ संवेदनशील इलाकों में अभी भी जातीय संघर्ष और हिंसा की छिटपुट घटनाएं सामने आ रही हैं, जिसके चलते स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों की सिफारिश पर सरकार को यह एहतियाती कदम उठाना पड़ा है ताकि राज्य में कानून व्यवस्था हाथ से बाहर न जाने पाए।
मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के किन इलाकों पर रहेगा असर?
गृह मंत्रालय की इस नई अधिसूचना के अनुसार, मणिपुर राज्य में इंफाल घाटी के कुछ हिस्सों को छोड़कर पहाड़ी जिलों और म्यांमार सीमा से सटे संवेदनशील क्षेत्रों में AFSPA का विस्तार जारी रखा गया है। मणिपुर में पिछले लंबे समय से बहुसंख्यक मैतेई और कुकी समुदायों के बीच चल रहे जातीय तनाव के कारण सुरक्षा बलों की तैनाती को बनाए रखना बेहद अनिवार्य माना जा रहा है। इसी प्रकार, नागालैंड के कई जिलों और अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, तिरप और लोंगडिंग जैसे जिलों तथा असम की सीमा से लगे कुछ थाना क्षेत्रों में भी इस अधिनियम की मियाद को बढ़ाया गया है। इन इलाकों में सक्रिय भूमिगत उग्रवादी समूहों (Insurgent Groups) और अवैध हथियारों की तस्करी जैसी गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए सेना और सुरक्षाबलों के पास विशेष शक्तियों का होना प्रशासन द्वारा आवश्यक बताया गया है।
क्षेत्रीय शांति, मानवाधिकार बहस और भविष्य की रणनीतिक चुनौतियां
पूर्वोत्तर राज्यों में AFSPA के विस्तार को लेकर हमेशा से एक तरफ जहां सुरक्षा की अनिवार्यता की दलील दी जाती रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों द्वारा इसके कुछ प्रावधानों को लेकर समय-समय पर चिंताएं भी जाहिर की जाती रही हैं। हालांकि, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का हमेशा से यह पक्ष रहा है कि जब तक क्षेत्र में पूरी तरह से शांति, सुरक्षा और सामान्य स्थिति बहाल नहीं हो जाती, तब तक राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। गृह मंत्रालय लगातार इस बात की समीक्षा कर रहा है कि जैसे-जैसे स्थिति सामान्य होती जाएगी, वैसे-वैसे देश के इन हिस्सों से AFSPA को पूरी तरह से हटा लिया जाएगा। फिलहाल, अगले छह महीनों के लिए इस कानून के बने रहने से सुरक्षा बलों को आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने की पूरी कानूनी छूट मिलती रहेगी, जिससे क्षेत्र में अलगाववादी ताकतों के मंसूबों पर लगाम कसने में मदद मिलेगी।
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