
शहरी इलाकों में पालतू जानवरों को शौक पूरा होने, बीमारी, बढ़ती उम्र या आक्रामक व्यवहार के कारण बेसहारा सड़कों पर छोड़ देने (Abandoned Pets) की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रशासन और नगर निकायों ने कड़ा रुख अपनाया है। कई बार लोग पपीज या विदेशी नस्ल के कुत्तों को बड़े उत्साह से खरीद तो लेते हैं, लेकिन जब उनके टीकाकरण, भोजन या मेडिकल खर्च की जिम्मेदारी बढ़ती है, तो उन्हें चुपचाप रात के अंधेरे में किसी सुनसान सड़क या चौराहे पर लावारिस फेंक देते हैं। इस गैर-जिम्मेदाराना और अमानवीय रवैये को रोकने के लिए नगर निगमों और पशु कल्याण बोर्ड ने नियमों को अत्यंत कड़ा कर दिया है। अब पालतू जानवर को लावारिस छोड़ने पर मालिक पर 25,000 रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जाएगा और मालिक की पहचान पालतू के शरीर में लगी 'माइक्रोचिप' के डिजिटल डेटा से मिनटों में की जाएगी।
माइक्रोचिप ट्रैकिंग तकनीक: कैसे पकड़ा जाएगा बेसहारा छोड़ने वाला मालिक
नई व्यवस्था के तहत अब पालतू जानवरों का केवल कागजी रजिस्ट्रेशन ही अनिवार्य नहीं है, बल्कि उनके शरीर में आरएफ-आईडी (RFID) आधारित सब-क्यूटेनियस माइक्रोचिप लगाना अनिवार्य किया जा रहा है। चावल के दाने के बराबर यह बायो-कंपैटिबल चिप पशु चिकित्सक द्वारा जानवर की गर्दन की ढीली त्वचा के नीचे इंप्लांट की जाती है। इस माइक्रोचिप में एक यूनिक 15-डिजिट का आइडेंटिफिकेशन नंबर दर्ज होता है।
जब कोई लावारिस कुत्ता या बिल्ली सड़क पर घूमते हुए नगर निगम की डॉग कैचर टीम या पशु अधिकार कार्यकर्ताओं को मिलता है, तो वे हैंडहेल्ड स्कैनर की मदद से जानवर की गर्दन को स्कैन करते हैं। स्कैनर पर चिप का कोड आते ही नगर निगम के सेंट्रलाइज्ड पेट रजिस्ट्री पोर्टल पर मालिक का पूरा ब्योरा खुल जाता है—जिसमें मालिक का नाम, मोबाइल नंबर, आधार लिंक और घर का स्थायी पता शामिल होता है। इससे मालिक यह बहाना बनाकर नहीं बच सकता कि यह जानवर उसका नहीं है।
25,000 रुपये का जुर्माना और पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कानूनी शिकंजा
माइक्रोचिप डेटाबेस से पहचान स्थापित होते ही संबंधित निकाय मालिक को औपचारिक नोटिस भेजेगा और सीधे 25,000 रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा। यदि मालिक जुर्माना भरने से इनकार करता है या पालतू को जानबूझकर क्रूरता के साथ मरने के लिए छोड़ने की पुष्टि होती है, तो उसके खिलाफ पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत पुलिस में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।
इस कानूनी प्रावधान के तहत जुर्माने के साथ-साथ तीन महीने से लेकर जेल तक की सजा का प्रावधान है। साथ ही, उस व्यक्ति का नाम 'ब्लैकलिस्ट' कर दिया जाएगा, जिससे वह भविष्य में कभी भी किसी मान्यता प्राप्त ब्रीडर, शेल्टर या संस्था से दूसरा पालतू जानवर कानूनी रूप से नहीं पाल सकेगा।
पालतू जानवरों को लावारिस छोड़ने से बढ़ता है स्ट्रीट डॉग अटैक और रेबीज का खतरा
प्रशासन द्वारा इतना सख्त कदम उठाने के पीछे सबसे बड़ा कारण शहरों में आवारा श्वानों के हमले और रेबीज का तेजी से बढ़ता खतरा है। जब घरों में पले-बढ़े पालतू कुत्तों (विशेषकर लैब्राडोर, पिटबुल, रॉटवीलर या जर्मन शेफर्ड जैसी नस्लों) को अचानक बाहर सड़कों पर फेंक दिया जाता है, तो वे सड़क पर जीवित रहने और भोजन जुटाने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते। भूख, प्यास, अन्य आवारा श्वानों के हमलों और भय के कारण वे अत्यंत आक्रामक व असुरक्षित हो जाते हैं।
इसके चलते वे सड़कों पर चलने वाले बच्चों, बुजुर्गों, साइकिल सवारों और राहगीरों पर हिंसक हमले कर देते हैं। इसके अलावा बिना वैक्सीनेशन के छोड़े गए जानवर रेबीज जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक बन जाते हैं, जिससे आम जनता की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
नए पेट ओनरशिप नियम: अनिवार्य लाइसेंस, वैक्सीनेशन और वार्षिक रिन्युअल
मेट्रो शहरों से लेकर टियर-2 शहरों (जैसे दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, मुंबई, बेंगलुरु, चंडीगढ़ और पुणे) में नगर पालिकाओं ने पेट ओनरशिप को लेकर सख्त गाइडलाइंस जारी की हैं:
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अनिवार्य लाइसेंसिंग: प्रत्येक पालतू कुत्ते और बिल्ली का नगर निगम के ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण और सालाना रिन्युअल अनिवार्य है।
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पूर्ण वैक्सीनेशन कार्ड: एंटी-रेबीज वैक्सीनेशन (ARV) और कोर-वैक्सीन के रिकॉर्ड के बिना लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा।
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माइक्रोचिपिंग की अनिवार्यता: लाइसेंस तभी अप्रूव होगा जब रजिस्टर्ड वेटरनरी डॉक्टर द्वारा जारी माइक्रोचिप सर्टिफिकेट अपलोड किया जाएगा।
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सार्वजनिक स्थलों पर लीश (पट्टा) और स्कूपर: पालतू को घुमाते समय पट्टा बांधना और शौच के बाद गंदगी को साफ करने की जिम्मेदारी मालिक की होगी, उल्लंघन पर मौके पर चालान काटा जाएगा।
यदि पालतू को पालने में असमर्थ हैं, तो क्या है सही और कानूनी रास्ता?
यदि किसी पारिवारिक, स्वास्थ्य या आर्थिक संकट के कारण कोई परिवार अपने पालतू जानवर की देखभाल करने में असमर्थ है, तो उसे सड़क पर फेंकने के बजाय विधिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। मालिक अपने शहर के नगर निगम द्वारा संचालित शेल्टर होम, मान्यता प्राप्त गैर-सरकारी पशु कल्याण संगठनों (NGOs) या अधिकृत एनिमल एडॉप्शन सेंटर्स से संपर्क कर सकते हैं। वहां विधिवत कागजी औपचारिकताएं पूरी कर और एडॉप्शन फीस जमा करके पालतू को सरेंडर किया जा सकता है, ताकि उसे कोई दूसरा जिम्मेदार परिवार गोद ले सके।
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