
फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला संकरा समुद्री गलियारा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) वैश्विक ऊर्जा व्यापार की रीढ़ माना जाता है। अपनी सबसे संकरी जगह पर महज 33 से 39 किलोमीटर चौड़ा यह जलमार्ग रणनीतिक दृष्टिकोण से दुनिया का सबसे बड़ा 'चोकपॉइंट' है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया भर में समुद्री मार्ग से होने वाले कुल कच्चे तेल (Crude Oil) और पेट्रोलियम उत्पादों के व्यापार का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है।
सऊदी अरब, ईरान, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल व गैस निर्यातक देशों की अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह से इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर हैं। तेल के अलावा, यूरोप और एशिया को मिलने वाली कुल तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा और दुनिया के 30 प्रतिशत से अधिक यूरिया व अमोनिया उर्वरक (Fertilizer) का निर्यात भी होर्मुज से ही होता है। इस जलमार्ग के उत्तरी हिस्से पर ईरान का और दक्षिणी हिस्से पर ओमान के मुसैंडम प्रायद्वीप का नियंत्रण है, जिसके चलते इस क्षेत्र में होने वाली किसी भी सैन्य हलचल का सीधा असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था की नब्ज पर पड़ता है।
टकराव की पृष्ठभूमि: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष और नाकेबंदी
वर्तमान होर्मुज संकट की जड़ें अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच भड़के सीधे सैन्य टकराव से जुड़ी हुई हैं। ईरान के सामरिक व परमाणु प्रतिष्ठानों पर पश्चिमी हमलों के जवाब में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अपने रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। ईरान ने इस जलमार्ग से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों और तेल टैंकरों पर प्रतिबंध लगाते हुए चेतावनी दी कि पश्चिमी देशों और उनके सहयोगी मुल्कों के किसी भी जहाज को यहां से गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इसके जवाब में अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने नौसैनिक युद्धपोतों, विध्वंसकों और विमानवाहक पोतों की भारी तैनाती कर दी, जिसे 'वॉल ऑफ स्टील' का नाम दिया गया। ईरानी तटों और बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी और दूसरी ओर समुद्र में बारूदी सुरंगें बिछाने व ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस पूरे इलाके को बारूद के ढेर में तब्दील कर दिया। परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और बीमा फर्मों ने भारी जोखिम के डर से अपने विशाल तेल टैंकरों को इस मार्ग पर भेजने से मना कर दिया, जिससे सामान्य दिनों में रोजाना गुजरने वाले 130 से अधिक जहाजों का आवागमन ठप होकर नगण्य हो गया।
तेहरान की कड़ी शर्तें और वॉशिंगटन का अडिग रुख: कूटनीतिक गतिरोध के मुख्य बिंदु
होर्मुज जलडमरूमध्य को सामान्य नौवहन के लिए फिर से खोलने को लेकर दोनों पक्षों के बीच भारी राजनीतिक और कूटनीतिक गतिरोध बना हुआ है। ईरानी सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी सैन्य आक्रामकता को पूरी तरह बंद नहीं करता और उनकी पूर्वशर्तों को स्वीकार नहीं करता, तब तक यह रणनीतिक जलमार्ग बंद रहेगा।
ईरान ने जलमार्ग को सुचारू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए मुख्य रूप से चार शर्तें रखी हैं:
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अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों और क्षेत्रीय जलक्षेत्र की नाकेबंदी को तत्काल और बिना शर्त समाप्त किया जाए।
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सैन्य टकराव के दौरान हुए नुकसान के एवज में ईरान को पूर्ण वित्तीय मुआवजा (War Compensation) दिया जाए।
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ईरान पर लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और विदेशों में फ्रीज की गई उसकी अरबों डॉलर की संपत्तियां जारी की जाएं।
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फारस की खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों के एकतरफा दबदबे को समाप्त कर तटीय देशों (ईरान और ओमान) के संप्रभु अधिकारों को मान्यता दी जाए।
दूसरी तरफ, अमेरिकी प्रशासन का रुख यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के तहत जलमार्गों में 'फ्रीडम ऑफ नेविगेशन' (निर्बाध नौवहन की स्वतंत्रता) एक सार्वभौमिक अधिकार है और अमेरिका किसी भी कीमत पर होर्मुज पर ईरान के एकतरफा नियंत्रण या जहाजों से टैक्स वसूलने की मांग को स्वीकार नहीं करेगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मार: 1970 के दशक के बाद का सबसे बड़ा ऊर्जा व्यवधान
होर्मुज जलडमरूमध्य की इस प्रभावी बंदी को ऊर्जा अर्थशास्त्रियों ने 1973 के तेल संकट के बाद दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा झटका (Supply Shock) करार दिया है। इस व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में कच्चा तेल (Brent Crude) तेजी से उछलकर $100 से $126 प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। ऊर्जा की आपूर्ति शृंखला टूटने से विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में महंगाई की नई लहर पैदा हो गई है।
कच्चे तेल के अलावा प्राकृतिक गैस का संकट भी गहरा गया है। कतर दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यातक है, जिसका सारा गैस उत्पादन होर्मुज के रास्ते ही दुनिया भर में भेजा जाता है। इस सप्लाई के बाधित होने से यूरोप और एशियाई देशों में बिजली उत्पादन, औद्योगिक विनिर्माण और रासायनिक कारखानों पर ताले लटकने की नौबत आ गई है। इसके साथ ही, दुनिया भर में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) अपने दशकों के निचले स्तर पर आ गए हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति से निपटने की देशों की क्षमता भी सीमित हो चुकी है।
वैकल्पिक मार्गों की तलाश और सीमाएं: क्या पाइपलाइंस बन सकती हैं होर्मुज का विकल्प?
संकट के गहराने के साथ ही खाड़ी देशों और वैश्विक शक्तियों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास करने वाले वैकल्पिक भूमिगत मार्गों (Pipelines) को तेज करने पर विचार शुरू किया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अपनी फुजैराह (Fujairah) तेल पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाने पर काम तेज किया है, जो होर्मुज के बाहर सीधे ओमान की खाड़ी में तेल निर्यात करने की सुविधा देती है। इसी तरह सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम पेट्रोलाइन (East-West Pipeline) लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक कुछ तेल पहुंचा सकती है, और इराक व तुर्की ने किरकुक-सीहान पाइपलाइन के जरिए निर्यात बढ़ाने के समझौते किए हैं।
हालांकि, ऊर्जा विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ये तमाम पाइपलाइंस मिलकर भी होर्मुज से निकलने वाले प्रतिदिन के 2 करोड़ बैरल से अधिक तेल और भारी मात्रा में एलएनजी का विकल्प नहीं बन सकतीं। कुवैत और कतर जैसे देशों के पास होर्मुज को बाईपास करने वाली कोई सीधी पाइपलाइन मौजूद ही नहीं है। इसके अलावा गैस और एलएनजी को पाइपलाइनों के जरिए अचानक री-रूट करना तकनीकी और वित्तीय रूप से बेहद जटिल है, जिसके चलते होर्मुज की निर्भरता को निकट भविष्य में पूरी तरह खत्म करना असंभव है।
भारत के लिए 'रेड अलर्ट': 85% तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा की अग्निपरीक्षा
होर्मुज संकट का सबसे ज्यादा संवेदनशील असर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर भारत पर पड़ता है। भारत अपनी कुल घरेलू आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल और करीब 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है। भारत के कुल तेल आयात का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा और कतर से आने वाली एलएनजी का एक विशाल हिस्सा इसी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंचता है।
भारत के लिए इस संकट के तीन बड़े खतरे हैं:
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चालू खाता घाटा (CAD) और मुद्रास्फीति: कच्चे तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल अरबों डॉलर बढ़ जाता है, जिससे रुपये की विनिमय दर पर दबाव आता है और घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ता है।
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उर्वरक और कृषि पर असर: खाड़ी देशों से यूरिया और अमोनिया की खेप रुकने से खरीफ और रबी फसलों के लिए रासायनिक खादों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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सामरिक भंडार की सीमा: भारत के विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर स्थित भूमिगत 'रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार' (SPR) केवल कुछ हफ्तों की आपातकालीन आपूर्ति ही संभाल सकते हैं। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा कूटनीति के तहत रूस, पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका से तेल आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधनों (जैसे एथेनॉल और ग्रीन हाइड्रोजन) के प्रयोग में तेजी लानी पड़ रही है।
ओमान की मध्यस्थता और आगे की राह: क्या कूटनीति से निकलेगा कोई ठोस समाधान?
इस विकराल संकट के बीच खाड़ी देश ओमान एक बार फिर एक निष्पक्ष और शांतिदूत की भूमिका में आगे आया है। मस्कट में ईरानी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के बीच जहाजों के लिए सुरक्षित 'ट्रांजिट कॉरिडोर' और तकनीकी नेविगेशन नियमों को तय करने के लिए गहन बातचीत जारी है। हाल ही में दोनों तटीय देशों के बीच एक नए शिपिंग रूट मैप को लेकर सहमति बनने के सकारात्मक संकेत भी मिले हैं।
संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने दोनों पक्षों से अधिकतम संयम बरतने और समुद्र में फंसे हजारों निर्दोष नाविकों व जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की पुरजोर अपील की है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या अमेरिका और ईरान अपने कड़े रुख में नरमी लाकर एक व्यावहारिक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं, या फिर होर्मुज का यह सामरिक गतिरोध 21वीं सदी के सबसे बड़े वैश्विक आर्थिक और ऊर्जा संकट का रूप लेकर दुनिया को एक नई मंदी की ओर धकेलेगा।
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