
भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण, हाई-स्पीड ट्रेनों और 'अमृत भारत स्टेशन योजना' के दावों के बीच देश के शीर्ष लेखा परीक्षक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने रेलवे स्टेशनों की जमीनी हकीकत को बेपर्दा कर दिया है। संसद के पटल पर पेश की गई 'भारतीय रेलवे में गैर-उपनगरीय स्टेशनों पर यात्री सुविधाएं और स्वच्छता' शीर्षक वाली इस विस्तृत रिपोर्ट में सामने आया है कि देश के लगभग 89.45 प्रतिशत (करीब 90%) रेलवे स्टेशन यात्रियों के लिए निर्धारित न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं (Minimum Essential Amenities – MEA) को पूरा करने में बुरी तरह विफल साबित हुए हैं।
सीएजी ने देश के सभी 16 रेलवे जोनों के तहत आने वाले 512 गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों का गहन निरीक्षण किया था, जिसमें अमृत भारत योजना के तहत चयनित 187 स्टेशन भी शामिल थे। ऑडिट में पाया गया कि 512 में से 458 स्टेशनों पर पीने का साफ पानी, पर्याप्त शौचालय, बैठने की बेंच, प्लेटफॉर्म शेड, पंखे, वाटर कूलर या दिशा-सूचक बोर्ड में से एक या अधिक अनिवार्य सुविधाओं की भारी कमी थी। देश के कुल 512 में से केवल 54 स्टेशन ही ऐसे पाए गए, जहां रेलवे बोर्ड के निर्धारित मानकों के अनुरूप बिना किसी कमी के सुविधाएं उपलब्ध थीं। यह ऑडिट वर्ष 2019-20 से 2023-24 की पांच वर्षीय अवधि के आंकड़ों और जमीनी जांच पर आधारित है, जिसके दायरे में आने वाले स्टेशन रोजाना 7,400 से अधिक ट्रेनों और 2.9 अरब से अधिक यात्रियों की आवाजाही को संभालते हैं।
वॉटर कूलर में मिला इंसानी मल में पाया जाने वाला E. Coli बैक्टीरिया: CSMT समेत 8 बड़े जंक्शनों पर दूषित पानी
कैग रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला और स्वास्थ्य के लिहाज से खतरनाक पहलू स्टेशनों पर यात्रियों को पिलाए जा रहे पीने के पानी की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। रेलवे स्वास्थ्य निरीक्षकों द्वारा लिए गए पानी के नमूनों के रासायनिक और बैक्टीरियोलॉजिकल विश्लेषण में पाया गया कि देश के 8 प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों के लिए लगाए गए वॉटर कूलरों के पानी में 'ई-कोलाई' (E. coli) बैक्टीरिया मौजूद था।
ई-कोलाई आमतौर पर इंसानी व पशुओं के मल या सीवेज के पानी में मिलने वाला बैक्टीरिया है, जिसके सेवन से गंभीर डायरिया, फूड पॉइजनिंग, पेट में ऐंठन और चरम मामलों में किडनी फेलियर का खतरा रहता है। जिन स्टेशनों के वाटर कूलर के पानी में ई-कोलाई पाया गया, उनमें मध्य रेलवे का छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT मुंबई), कल्याण, लोनावला, भिवंडी रोड, दक्षिण रेलवे का कोयंबटूर और पालक्काड जंक्शन, दक्षिण मध्य रेलवे का हैदराबाद, और पूर्व रेलवे का मधुपुर जंक्शन शामिल हैं। इसके अलावा, प्लेटफॉर्म पर लगे नलों के पानी की जांच में वर्ष 2022-23 में 8 जोनों के 49 स्टेशनों और 2023-24 में 9 जोनों के 56 स्टेशनों पर टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 63 स्टेशनों पर पानी में कीटाणुनाशक 'रेसिड्यूअल क्लोरीन' की मात्रा तय सीमा (0.2 से 0.5 पीपीएम) से बाहर थी और 59 स्टेशनों पर तो पानी की बैक्टीरियोलॉजिकल जांच ही नहीं की गई थी।
शौचालयों और नलों का भारी अकाल: 2,035 स्टेशनों पर पानी के नल कम, 403 स्टेशनों पर यूरिनल की कमी
रेलवे के 'पैसेंजर एमिनिटीज मैनेजमेंट सिस्टम' (PAMS) के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए सीएजी ने बताया कि बुनियादी ढांचे की कमी किसी एक जोन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे रेल नेटवर्क में एक प्रणालीगत खामी (Systemic Failure) बन चुकी है।
ऑडिट में उजागर हुई प्रमुख ढांचागत कमियां:
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शौचालय व यूरिनल्स: 201 स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या के अनुपात में लैट्रिन (शौचालय) की भारी कमी थी, जबकि 403 स्टेशनों पर निर्धारित संख्या से काफी कम यूरिनल्स उपलब्ध थे। 'पे-एंड-यूज' शौचालयों की स्वच्छता बेहद दयनीय पाई गई।
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पीने के पानी के नल: पूरे नेटवर्क के 2,035 स्टेशनों पर यात्रियों के अनुपात में नलों की पर्याप्त संख्या नहीं थी। 40% स्टेशनों पर वाटर कूलर और 27% स्टेशनों पर नलों की कमी दर्ज की गई।
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पंखे और शेल्टर: 42% स्टेशनों पर गर्मी से राहत के लिए जरूरी पंखे नहीं थे और कई प्लेटफॉर्म्स पर यात्रियों को धूप व बारिश से बचाने के लिए छत (Platform Cover Shed) मौजूद नहीं थी।
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अनाधिकृत प्रवेश मार्ग: दर्जनों स्टेशनों पर बाउंड्री वॉल टूटी होने और अनाधिकृत रास्तों के खुले होने के कारण आवारा मवेशी प्लेटफॉर्मों पर घूमते पाए गए, जिससे गंदगी और यात्रियों की सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा होता है।
बजट की कोई कमी नहीं, फिर भी 36% से 44% फंड पड़ा रहा बिना खर्च: खराब प्लानिंग का नतीजा
यात्री सुविधाओं के खस्ताहाल होने का कारण बजट की कमी नहीं, बल्कि रेलवे अधिकारियों की लचर योजना और क्रियान्वयन में भारी सुस्ती है। सीएजी ने कड़ी टिप्पणी करते हुए उजागर किया कि वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के दौरान केंद्र सरकार द्वारा यात्री सुविधाओं के लिए आवंटित बजट का 36 प्रतिशत से लेकर 44 प्रतिशत हिस्सा हर साल बिना खर्च किए ही सरेंडर कर दिया गया।
अकेले वित्त वर्ष 2023-24 में यात्री सुविधाओं के लिए जारी बजट में से लगभग ₹5,956 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए जा सके। इसके अलावा, स्टेशनों पर विकास व सुधार से जुड़े 395 स्वीकृत कार्यों में से 59% कार्य अपने निर्धारित समय से 1 वर्ष से लेकर 4 वर्ष से अधिक की देरी से चल रहे थे। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के स्पष्ट आदेश के बावजूद मार्च 2024 तक किसी भी रेलवे जोन ने स्टेशनों पर कचरा प्रबंधन और स्वच्छता एक्शन प्लान की जानकारी देने वाले आधिकारिक वेबपेज संचालित नहीं किए थे।
आपातकालीन चिकित्सा और दिव्यांग यात्रियों के साथ भारी अनदेखी
स्टेशनों पर बीमार पड़ने वाले यात्रियों या हादसों के शिकार लोगों के लिए आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहद चिंताजनक पाई गई। सीएजी की जांच में 512 में से 441 स्टेशनों पर न तो कोई 'इमरजेंसी मेडिकल रूम' (EMR) मौजूद था और न ही रेलवे नियमों के तहत अनिवार्य मानक मेडिकल फर्स्ट-एड बॉक्स रखा गया था।
दिव्यांगजनों और बुजुर्ग यात्रियों के लिए सुगम्यता (Accessibility) के मोर्चे पर भी गंभीर विसंगतियां सामने आईं:
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प्राथमिकता सीटिंग: 490 स्टेशनों पर दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीटों की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी।
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दिव्यांग अनुकूल शौचालय: 134 स्टेशनों पर व्हीलचेयर-सुलभ (Accessible Toilets) शौचालय उपलब्ध नहीं थे या उन पर ताले लटके मिले।
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सहायता केंद्र: 131 स्टेशनों पर दिव्यांगों की मदद के लिए निर्धारित हेल्प बूथ और टैक्टाइल पाथवे (नेत्रहीनों के लिए विशेष फर्श) गायब थे।
रेल मदद पर बढ़ीं शिकायतें: 42% यात्रियों ने कहा- समाधान से नहीं मिली संतुष्टि
स्टेशनों पर बिगड़ती सुविधाओं और गंदगी का सीधा असर यात्रियों के गुस्से के रूप में सामने आया है। रेलवे के शिकायत निवारण पोर्टल 'रेल मदद' (RailMadad) पर दर्ज यात्री शिकायतों की संख्या वित्त वर्ष 2022-23 में 69,196 से बढ़कर 2023-24 में 74,967 पर पहुंच गई।
शिकायतों के समाधान के बाद जब रेलवे ने यात्रियों से फीडबैक लिया, तो अपनी शिकायत के निपटारे से असंतुष्ट (Dissatisfied) होने वाले यात्रियों का प्रतिशत 37% से बढ़कर 42% पर पहुंच गया। यह आंकड़ा साबित करता है कि शिकायतों को कागजों पर तो बंद किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर यात्रियों को वास्तविक राहत नहीं मिल रही है।
CAG की रेलवे बोर्ड को सख्त सिफारिशें: तत्काल बदले व्यवस्था
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट के निष्कर्ष में रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय को कई ठोस सुधारात्मक कदम तत्काल प्रभाव से लागू करने की सिफारिश की है:
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यूनिफॉर्म वॉटर क्वालिटी प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन: सभी स्टेशनों पर पानी की स्वचालित क्लोरीन मॉनिटरिंग और अनिवार्य नियमित बैक्टीरियोलॉजिकल टेस्टिंग सुनिश्चित की जाए, ताकि जहरीले बैक्टीरिया की आपूर्ति को रोका जा सके।
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एमईए (MEA) की समयबद्ध बहाली: सभी 458 स्टेशनों पर कमियों को प्राथमिकता के आधार पर चिह्नित कर 6 महीने के भीतर पर्याप्त टॉयलेट्स, वाटर टैप्स और शेड्स लगाए जाएं।
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बजट का पूर्ण उपयोग: सरेंडर हो रहे हजारों करोड़ के बजट का उपयोग स्टेशनों के बुनियादी ढांचे और सफाई व्यवस्था को आउटसोर्स करने के बजाय आधुनिक ऑटोमैटिक क्लीनिंग मशीनों की खरीद में किया जाए।
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अमृत भारत योजना की निगरानी: केवल नए फसाड और स्टेशन की बाहरी साज-सज्जा पर ध्यान देने के बजाय प्लेटफॉर्म पर आम यात्री की प्राथमिक जरूरतों को पहले पूरा किया जाए।
सीएजी की इस व्यापक रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक रेलवे का प्रशासनिक तंत्र अपनी कार्यप्रणाली, फंड के उपयोग और जवाबदेही में बुनियादी बदलाव नहीं लाता, तब तक विश्वस्तरीय स्टेशनों का सपना आम भारतीय यात्रियों के लिए अधूरा ही रहेगा।
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