News India Live, Digital Desk: ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बार फिर महाराष्ट्र की सियासत में हलचल तेज हो गई है। वजह हैं समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आसिम आजमी, जिन्होंने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि वह ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएंगे। उनका कहना है कि एक सच्चा मुसलमान होने के नाते वह सिर्फ अल्लाह के आगे सिर झुका सकते हैं, किसी और की ‘वंदना’ नहीं कर सकते। उनके इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और मामला गरमा गया है।
आखिर पूरा मामला है क्या?
यह सब तब शुरू हुआ जब बीजेपी की तरफ से अबू आजमी को ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने पर हो रहे एक कार्यक्रम का न्योता दिया गया। इस न्योते के जवाब में आजमी ने कहा कि कोई भी उन्हें यह गीत गाने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
आजमी ने अपनी बात रखते हुए कहा, “हमारा ईमान है कि हम सिर्फ एक अल्लाह को मानते हैं। हम किसी के आगे, यहां तक कि अपनी मां के आगे भी सजदा नहीं करते।” उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जैसे आप किसी हिंदू को नमाज पढ़ने के लिए नहीं कह सकते, ठीक वैसे ही किसी मुसलमान को वंदे मातरम गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि वह राष्ट्रीय गीत का अपमान नहीं करते। जब भी सदन में यह बजता है, तो वह इसके सम्मान में खड़े होते हैं, लेकिन इसे गा नहीं सकते।
बीजेपी ने दिया तीखा जवाब
अबू आजमी का यह बयान आते ही बीजेपी हमलावर हो गई। बीजेपी के कई नेता और कार्यकर्ता आजमी के मुंबई वाले घर के बाहर जमा हो गए और ‘वंदे मातरम’ गाकर अपना विरोध जताया। इस प्रदर्शन में महाराष्ट्र सरकार के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा और विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर भी शामिल हुए।
बीजेपी नेताओं का कहना था कि अगर अबू आजमी को राष्ट्रीय गीत से इतनी ही दिक्कत है, तो उन्हें यह देश छोड़कर पाकिस्तान चले जाना चाहिए। उनका तर्क है कि भारत में रहना है तो देश के प्रतीकों का सम्मान करना ही होगा।
आजमी का बीजेपी पर पलटवार
आजमी ने इस पूरे विवाद के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि बीजेपी जानबूझकर ऐसे मुद्दों को हवा देती है ताकि समाज में हिंदू-मुसलमान के बीच खाई पैदा हो और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें।
यह कोई पहली बार नहीं है जब आजमी ने ‘वंदे मातरम’ को लेकर ऐसा स्टैंड लिया हो। वह पहले भी कई बार इस मुद्दे पर अपनी यही राय रख चुके हैं, और हर बार इसे लेकर राजनीतिक बहस छिड़ जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है, जिसने एक बार फिर राष्ट्रीय प्रतीकों और धार्मिक आस्था के बीच की महीन रेखा पर चर्चा शुरू कर दी है।
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