Tuesday , June 16 2026

Strait of Hormuz Operations: अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद ‘होर्मुज स्ट्रेट’ से निकला पहला भारतीय गैस जहाज ‘दिशा’; कतर से 62,000 टन LNG लेकर 18 जून को पहुंचेगा गुजरात

पश्चिम एशिया (Middle East) के युद्ध मैदान और कूटनीतिक गलियारों से भारत के लिए एक बेहद बड़ी, ऐतिहासिक और राहत भरी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच हुए बहुप्रतीक्षित शांति समझौते (US-Iran Peace Deal) के महज कुछ ही घंटों के भीतर दुनिया के सबसे खतरनाक और संवेदनशील समुद्री रास्ते 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) में जमी तनातनी की बर्फ तेजी से पिघलने लगी है।

इस वैश्विक समझौते की आधिकारिक घोषणा के बाद समंदर के इस सबसे बड़े और रणनीतिक 'चोकपॉइंट' (Chokepoint) को सीना तानकर सुरक्षित पार करने वाला दुनिया का सबसे पहला कमर्शियल मर्चेंट शिप कोई और नहीं, बल्कि भारत का विशालकाय एलएनजी (LNG) टैंकर 'दिशा' (Disha) बना है।

सबसे हैरान और गर्व करने वाली बात यह है कि पिछले कई हफ्तों से दुनिया भर के जो मालवाहक जहाज इस समुद्री रास्ते से पूरी तरह डरकर, छिपते-छिपाते और अंतरराष्ट्रीय ट्रैकिंग से बचने के लिए अपने ट्रांसपोंडर (लोकेशन सिग्नल) बंद करके गुजर रहे थे; वहीं भारतीय क्रू से लैस जहाज 'दिशा' ने अंतरराष्ट्रीय कड़े प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अपना ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) डंके की चोट पर ऑन रखा। यह जहाज लगातार सैटेलाइट्स को अपनी लाइव लोकेशन भेजते हुए बिना किसी नुकसान के ईरानी नौसेना के सामने से सुरक्षित बाहर निकल गया।

कतर से गैस का भारी खजाना लेकर 18 जून को गुजरात पहुंचेगा 'दिशा'

केंद्रीय शिपिंग मंत्रालय के निदेशक ओपेश कुमार शर्मा ने भारत की इस बड़ी नौसैनिक व व्यापारिक कामयाबी की आधिकारिक पुष्टि की है। भारत सरकार की नवरत्न कंपनी 'शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया' (SCI) द्वारा संचालित और माल्टा के झंडे (Flag of Malta) वाले इस विशालकाय जहाज को फारस की खाड़ी में भड़के भीषण युद्ध के कारण पिछले तीन महीनों से कतर के तट पर ही रोक कर रखा गया था।

  • गैस का महा-खजाना: एलएनजी कैरियर 'दिशा' अपने साथ 62,370 मीट्रिक टन लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) का भारी-भरकम और कीमती खजाना लेकर आ रहा है।

  • गुजरात में एंकरिंग: कतर के बंदरगाह से लोड हुआ यह गैस टैंकर होर्मुज स्ट्रेट के चक्रव्यूह को सफलतापूर्वक पार कर चुका है और आगामी 18 जून 2026 को गुजरात के दहेज बंदरगाह (Dahej Port) पर लंगर डालेगा। इस गैस की आमद से देश के घरेलू और औद्योगिक बाजारों में चल रही प्राकृतिक गैस की किल्लत तुरंत दूर हो जाएगी। पिछले दो महीनों के भीषण युद्ध के बीच इस खतरनाक रास्ते को पार करने वाला यह पहला भारतीय व्यापारिक पोत है।

'अग्निपरीक्षा' जैसा था सफर: याद आया 18 अप्रैल का वो खौफनाक मंजर

इस संकरे समुद्री मार्ग को पार करना जहाज 'दिशा' और उसके कैप्टन के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। भारत के मजबूत कूटनीतिक प्रयासों के चलते मार्च और अप्रैल की शुरुआत में कुछ जहाज खाड़ी से निकले जरूर थे, लेकिन 18 अप्रैल को इस जलमार्ग पर तब हाहाकार मच गया जब ईरानी नौसेना (IRGC) ने अचानक होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद कर दिया और वहां से जबरन गुजरने की कोशिश कर रहे कुछ भारतीय जहाजों पर सीधे रॉकेट और मशीन गन से गोलीबारी कर दी थी।

उस खौफनाक दिन सिर्फ एक भाग्यशाली भारतीय जहाज 'देश गरिमा' (Desh Garima) अपनी सूझबूझ से जान बचाकर गहरे समंदर में भागने में कामयाब रहा था। इस हमले के जवाब में अमेरिका ने भी ईरानी बंदरगाहों की सख्त नौसैनिक नाकेबंदी (Naval Blockade) कर दी थी, जिससे हालात बद से बदतर हो गए। भारत के लिए अरबों डॉलर का तेल और गैस लेकर आ रहे विदेशी जहाजों के पहिए जहां के तहां थम गए और तब से लेकर अब तक कोई भी भारतीय झंडे वाला जहाज इस चक्रव्यूह में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

भारत के लिए क्यों 'लाइफलाइन' माना जाता है होर्मुज का रास्ता?

बीते 28 फरवरी को मिडिल ईस्ट में सीधी जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी करके पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया था, क्योंकि युद्ध से पहले पूरी दुनिया का 20% तेल और गैस का व्यापार अकेले इसी संकरे रास्ते से होता था। इसके बंद होने से वैश्विक स्तर पर ईंधन की भारी किंवदंती और महंगाई शुरू हो गई थी। भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यह रूट देश की आर्थिक संप्रभुता की लाइफलाइन है, जिसे इन तीन बड़े आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है:

  1. 90% एलपीजी (रसोई गैस): भारत अपनी घरेलू रसोइयों को चालू रखने के लिए कुल जरूरत का 90% एलपीजी (रसोई गैस) इसी होर्मुज रूट और पश्चिम एशिया के देशों से आयात करता है। यही वजह है कि संकट गहराने पर केंद्र सरकार ने सबसे पहले अपने 8 एलपीजी टैंकरों को सुरक्षित निकालने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी।

  2. 60% एलएनजी (प्राकृतिक गैस): देश की बड़ी फैक्ट्रियों, फर्टिलाइजर प्लांट्स और पावर स्टेशन्स को बिजली देने वाली 60% एलएनजी (प्राकृतिक गैस) का आयात भी इसी स्ट्रेट के जरिए होता है, जिसकी बहाली अब कतर से आ रहे 'दिशा' जहाज ने की है।

  3. 40% कच्चा तेल (Crude Oil): देश की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों और उद्योगों के लिए ईंधन का मुख्य आधार यानी 40% कच्चा तेल भी इसी रास्ते से भारत के रिफाइनरी पोर्ट्स पर पहुंचता है। साफ है कि इस रास्ते में होने वाली जरा सी भी सैन्य हलचल सीधे भारतीय रसोइयों के बजट से लेकर सड़कों और फैक्ट्रियों के पहियों को जाम कर देती है।

फारस की खाड़ी में अभी भी कैद हैं 13 भारतीय जहाज; फूंक-फूंक कर रख रहे कदम

एलएनजी टैंकर 'दिशा' के सुरक्षित बाहर निकलने से भारतीय नौसेना और शिपिंग कंपनियों ने राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के विभिन्न बंदरगाहों और ओमान की खाड़ी में अभी भी 13 भारतीय कमर्शियल मालवाहक जहाज और उनके हजारों भारतीय नाविक (Sailors) फंसे हुए हैं। मार्च की शुरुआत से लेकर जून के मध्य तक केवल 10 भारतीय जहाज ही इस रास्ते को सुरक्षित पार करने में कामयाब रहे हैं।

शिपिंग कॉर्पोरेशन और समुद्री सुरक्षा के जानकारों का कहना है कि भले ही व्हाइट हाउस द्वारा अमेरिका-ईरान ऐतिहासिक कूटनीतिक डील की घोषणा कर दी गई हो और इसी हफ्ते समझौते के अंतिम दस्तावेजों पर दोनों देशों के दस्तखत होने वाले हैं, लेकिन वैश्विक शिपिंग और इंश्योरेंस कंपनियां अभी भी पूरी तरह फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। समंदर में जहाजों का ट्रैफिक पूरी तरह सामान्य होने में अभी कई हफ्तों का लंबा समय लग सकता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां यह देखना चाहती हैं कि पिछले 3 महीनों के कड़वे और हिंसक अनुभवों के बाद क्या ईरान इस शांति समझौते की शर्तों पर पूरी तरह टिकता है या नहीं। भारत सरकार के जहाजरानी मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जैसे ही इस रूट को अंतरराष्ट्रीय नौसेनाओं द्वारा पूरी तरह 'सेफ कॉरिडोर' घोषित किया जाएगा, खाड़ी में फंसे बाकी सभी 13 जहाजों को भी भारतीय नौसेना के सहयोग से तुरंत रेस्क्यू कर स्वदेश लाया जाएगा।