News India Live, Digital Desk: भूमध्य सागर के बीचों-बीच एक बार फिर तनाव अपने चरम पर पहुँच गया जब इज़रायली नौसेना ने गाज़ा की ओर मदद लेकर जा रहे दर्ज़नों जहाज़ों के एक काफिले को रोक दिया। इस काफिले में दुनिया भर के कई देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ता, डॉक्टर और पत्रकार सवार थे, जो अपने साथ खाने-पीने का सामान और दवाइयाँ लेकर गाज़ा की समुद्री नाकाबंदी तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।
इज़रायली सेना ने इस ऑपरेशन को अंतर्राष्ट्रीय जल क्षेत्र में, गाज़ा तट से लगभग 70 समुद्री मील की दूरी पर अंजाम दिया। “फ्रीडम फ्लोटिला कोएलिशन” और “ग्लोबल सुमुद फ्लोटिला” जैसे संगठनों द्वारा चलाए जा रहे इस मिशन में लगभग 44 छोटे-बड़े जहाज़ शामिल थे। काफिले के आयोजकों का आरोप है कि इज़रायली सेना ने जहाज़ों पर चढ़ने से पहले उनके कम्युनिकेशन सिग्नल को जाम कर दिया था।
दोनों पक्षों का क्या है कहना?
इज़रायल ने अपने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह काफिला “मानवीय सहायता की आड़ में एक उकसावे की कार्रवाई” थी। इज़रायली विदेश मंत्रालय ने इसे “एक युद्ध क्षेत्र में घुसने का व्यर्थ प्रयास” बताया और कहा कि गाज़ा की समुद्री नाकाबंदी कानून के दायरे में है।
वहीं, काफिले में शामिल कार्यकर्ताओं ने इज़रायल पर “अंतर्राष्ट्रीय जल में समुद्री डकैती” का आरोप लगाया है। उनका कहना था कि उनका मिशन पूरी तरह से अहिंसक था और वे जरूरतमंद लोगों तक मदद पहुँचाना चाहते थे।
दुनिया भर में कड़ी प्रतिक्रिया
इस घटना के बाद पूरी दुनिया में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है।
- संयुक्त राष्ट्र (UN) ने इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि “मानवीय सहायता को कभी भी अपराधीकरण नहीं किया जाना चाहिए।”
- एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे मानवाधिकार संगठनों ने इसे इज़रायल द्वारा “सामूहिक दंड” देने की कार्रवाई बताया।
- पेरिस, डबलिन और नेपल्स जैसे दुनिया के कई बड़े शहरों में इज़रायल के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन हुए।
- तुर्की, स्पेन और मलेशिया समेत कई देशों ने अपने नागरिकों की रिहाई की मांग की है।
इस काफिले में स्वीडन की जानी-मानी पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग की मौजूदगी ने भी इस घटना की ओर पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है।
इज़रायली नौसेना ने सभी कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया है और उन्हें इज़रायली बंदरगाह पर ले जाकर पूछताछ के बाद उनके देश वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह घटना 2010 के “मावी मारमारा” कांड की याद दिलाती है, जब इसी तरह के एक काफिले को रोकने के दौरान हुई हिंसा में नौ कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी।
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