
पड़ोसी देश पाकिस्तान में इन दिनों राजनीतिक और आंतरिक सुरक्षा का पारा अपने चरम पर है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ (PTI) के एक बड़े नेता के बयान ने देश की हुकूमत और सैन्य प्रतिष्ठान के होश उड़ा दिए हैं। नेता ने सीधे तौर पर हमला बोलते हुए कहा है कि यदि सरकार और सेना का रवैया ऐसा ही दमनकारी रहा, तो वे 'इस्लामाबाद को सोमनाथ' बना देंगे। इतिहास और धर्म के पन्नों से जुड़े इस संवेदनशील बयान और महमूद गजनवी के नाम का जिक्र आने के बाद पाकिस्तान के सत्ता के गलियारों में सनसनी फैल गई है। इस सनसनीखेज धमकी के बाद सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के खेमे में गहरी खलबली मच गई है। आइए जानते हैं कि इस तीखे बयान के पीछे की पूरी कहानी क्या है और इसके क्या राजनीतिक मायने हैं।
पाकिस्तान की सियासत में पिछले कुछ महीनों से तनाव का माहौल लगातार गहराता जा रहा है। एक तरफ जहां इमरान खान की पार्टी पर लगातार कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के नेता और कार्यकर्ता सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खुलकर सड़कों पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से दिए गए इस भड़काऊ भाषण में पीटीआई नेता ने सत्ताधारी गठबंधन और शक्तिशाली सैन्य नेतृत्व को आड़े हाथों लिया। उन्होंने महमूद गजनवी के हमलों और ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए ऐसी भाषा का प्रयोग किया, जिसने पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों को सकते में डाल दिया है। इस तरह की बयानोंबाजी से देश की आंतरिक शांति और कानून व्यवस्था पर एक बार फिर बड़ा सवालिया निशान लग गया है।
महमूद गजनवी के नाम पर सियासत: पाकिस्तान में क्यों गरमाया है धार्मिक और राजनीतिक माहौल?
पाकिस्तान की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों और ऐतिहासिक आक्रामकता के प्रतीकों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार का संदर्भ सीधे तौर पर देश की राजधानी इस्लामाबाद और वहां बैठे हुक्मरानों को चुनौती देने से जुड़ा है। पीटीआई नेता द्वारा 'सोमनाथ' और 'गजनवी' जैसे शब्दों का प्रयोग करने का मुख्य उद्देश्य सरकार और सेना को यह संदेश देना था कि वे किसी भी दवाब में झुकने वाले नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयांबाजी से ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है और देश में पहले से सुलग रही राजनीतिक आग में घी का काम होता है। सरकार इस बयान को देशद्रोह और सैन्य नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत के रूप में देख रही है, जिसके चलते पीटीआई नेताओं पर और अधिक सख्त कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
पाकिस्तान के मौजूदा हालात को देखा जाए तो इस्लामाबाद और रावलपिंडी पहले से ही छावनी में तब्दील हैं। जगह-जगह भारी पुलिस बल, रेंजर्स और सेना के जवानों की तैनाती की गई है। ऐसे समय में विपक्ष के किसी वरिष्ठ नेता द्वारा इस स्तर की आक्रामक चेतावनी देना यह साफ दर्शाता है कि दोनों पक्षों के बीच अब आर-पार की लड़ाई का मन बन चुका है। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार विपक्ष के किसी भी विरोध प्रदर्शन को कुचलने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध नजर आ रही है, जबकि पीटीआई के कार्यकर्ता अपने सर्वोच्च नेता इमरान खान की रिहाई और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहे हैं।
शहबाज सरकार और सेना प्रमुख असीम मुनीर के सामने आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा संकट
पाकिस्तान की मौजूदा हुकूमत के लिए यह समय बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था पहले ही वेंटिलेटर पर है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों के बोझ तले आम जनता त्रस्त हो चुकी है। ऐसे में यदि राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा होते हैं, तो देश को संभालना नामुमकिन हो जाएगा। सैन्य नेतृत्व इस बात से बेहद चिंतित है कि अगर राजधानी के भीतर इस तरह की उग्र बयानबाजी और प्रदर्शन कामयाब होते हैं, तो सेना की छवि को देश और दुनिया के सामने भारी आघात पहुंचेगा। यही कारण है कि प्रशासन ने बिना किसी नरमी के विपक्ष के नेताओं के खिलाफ ताबड़तोड़ छापे मारने और उन्हें हिरासत में लेने की कार्रवाई तेज कर दी है।
विपक्षी पार्टी के समर्थकों का कहना है कि सरकार और सेना मिलकर उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंट रही है। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और प्रदर्शन करने के संवैधानिक अधिकार को भी बलपूर्वक कुचला जा रहा है। नेताओं का यह भी आरोप है कि जब न्यायपालिका और प्रशासन दोनों ही सत्ताधारी गठबंधन के इशारे पर काम करने लगे हों, तो जनता के पास विरोध के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता है। यही वजह है कि नेताओं के भाषणों में इस तरह के तीखे और आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है, जो सीधे तौर पर देश की केंद्रीय सत्ता और व्यवस्था को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान की किरकिरी
पाकिस्तान के इन आंतरिक हालातों का असर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी साफ दिखाई देने लगा है। दुनिया भर के प्रमुख देश और मीडिया संस्थान पाकिस्तान की इस राजनीतिक उठापटक पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। परमाणु शक्ति संपन्न देश में इस तरह के आंतरिक संघर्ष और चरमपंथी या ऐतिहासिक बयानों का दौर वैश्विक निवेशकों के मन में गहरी आशंकाएं पैदा कर रहा है। विदेशी निवेशक इस तरह के अस्थिर माहौल वाले देश में अपना पैसा लगाने से पूरी तरह कतरा रहे हैं, जिससे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार गर्त में जा रहा है। पश्चिमी देशों के कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जल्द ही राजनीतिक संवाद का रास्ता नहीं अपनाया, तो देश एक गंभीर और अनियंत्रित गृहयुद्ध की चपेट में आ सकता है।
आने वाले दिनों में पाकिस्तान की सियासत किस करवट बैठेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार विपक्ष के इस दबाव से कैसे निपटती है। क्या पीटीआई के नेता अपनी इन चेतावनियों को अमलीजामा पहनाने में कामयाब होंगे या फिर सेना और सरकार मिलकर इस जनआंदोलन को पूरी तरह से कुचल देंगी? स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है और हर पल नए राजनीतिक समीकरण सामने आ रहे हैं। आम पाकिस्तानी नागरिक इस सत्ता की लड़ाई में पिसता जा रहा है, जिसे न तो दो वक्त की रोटी ढंग से मिल पा रही है और न ही देश में सुरक्षा का कोई भरोसा बचा है। इतिहास के पन्नों से निकालकर दिए गए इस धमकी भरे बयान ने यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान का राजनीतिक भविष्य फिलहाल भारी अनिश्चितता के बादलों के बीच घिरा हुआ है।
UK News