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इस्लामाबाद लॉकडाउन जैसे कड़े हालात, पाकिस्तान में ऐसा क्या होने जा रहा है जिससे डरे असीम मुनीर

पड़ोसी देश पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और रावलपिंडी इन दिनों किसी युद्ध के मैदान या छावनी में तब्दील नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान के इन प्रमुख शहरों में अचानक से लॉकडाउन जैसे हालात पैदा हो जाने से आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। सड़कों पर भारी पुलिस बल और सेना के जवानों की तैनाती ने लोगों के दिलों में एक अनजाना खौफ पैदा कर दिया है। हर तरफ बस यही चर्चा हो रही है कि आखिर पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों में ऐसा क्या बड़ा घटनाक्रम चल रहा है जिसके कारण देश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व और विशेषकर सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के खेमे में गहरी चिंता और डर का माहौल बना हुआ है। इस हाई-वोल्टेज राजनीतिक और सुरक्षा संकट की पूरी कहानी क्या है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

पाकिस्तान में अचानक से पैदा हुए इन हालात के पीछे मुख्य वजह राजनीतिक अस्थिरता और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इन्साफ द्वारा बुलाए गए देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और मार्च बताए जा रहे हैं। सरकार और सेना किसी भी कीमत पर प्रदर्शनकारियों को राजधानी में प्रवेश करने से रोकना चाहती है, जिसके लिए इस्लामाबाद और रावलपिंडी की सभी मुख्य सीमाओं को सील कर दिया गया है। शहर के तमाम महत्वपूर्ण मार्गों पर बड़े-बड़े कंटेनर खड़े कर दिए गए हैं और कंटीले तार बिछा दिए गए हैं ताकि कोई भी आम नागरिक या राजनीतिक कार्यकर्ता राजधानी के अंदर न पहुंच सके। इस सुरक्षा घेराबंदी ने पूरे क्षेत्र को एक खुली जेल में बदल दिया है, जिससे वहां के स्थानीय नागरिकों को रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों के लिए भी भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

सेना प्रमुख असीम मुनीर की बढ़ी मुश्किलें और पाकिस्तान में गहराता सुरक्षा संकट

पाकिस्तान के मौजूदा हालात को देखकर साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश का सैन्य तंत्र इस समय अत्यधिक दबाव में है। फील्ड मार्शल कहे जाने वाले या पाकिस्तान की बागडोर असल मायनों में संभालने वाले सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के सामने इस समय आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा इम्तहान खड़ा हो गया है। एक तरफ जहां देश की चरमराती अर्थव्यवस्था से जनता पहले ही त्रस्त है, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक टकराव ने देश की आंतरिक शांति को पूरी तरह से खतरे में डाल दिया है। सेना और खुफिया एजेंसियों को इस बात का डर सता रहा है कि यदि जनसैलाब राजधानी में घुसने में कामयाब हो गया, तो सरकार के साथ-साथ सैन्य नेतृत्व के खिलाफ भी बगावत का एक बड़ा दौर शुरू हो सकता है, जिससे उनकी सत्ता की नींव हिल सकती है।

राजधानी इस्लामाबाद और छावनी शहर रावलपिंडी में सुरक्षा के कड़े इंतजामों के तहत इंटरनेट सेवाओं को भी कई जगहों पर बाधित या पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदियां लगाने के साथ ही धारा 144 अनिश्चितकाल के लिए लागू कर दी गई है, जिसके तहत पांच या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। सुरक्षा बलों ने जगह-जगह भारी गश्त शुरू कर दी है और हर आने-जाने वाले संदिग्ध वाहन की गहन तलाशी ली जा रही है। स्कूल, कॉलेज, और व्यावसायिक बाजार एहतियात के तौर पर बंद रखे गए हैं, जिससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को रोजाना करोड़ों रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

पाकिस्तान की जनता का बढ़ता गुस्सा और विपक्ष का आक्रामक रुख

पाकिस्तान की आम जनता अब इस दमनकारी नीति और राजनीतिक उठापटक से बुरी तरह ऊब चुकी है। लोगों का कहना है कि सरकार अपनी राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात पैदा कर रही है। विपक्ष और असंतुष्ट राजनीतिक दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे सरकार के इन हथकंडों से डरने वाले नहीं हैं और वे अपने अधिकारों की लड़ाई हर हाल में जारी रखेंगे। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि जनरल असीम मुनीर के इशारे पर मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है और लोकतंत्र की आवाज को जबरन दबाने की कोशिश की जा रही है। आम नागरिकों का सड़कों पर चलना मुहाल हो चुका है क्योंकि पुलिस और प्रशासन हर चौक-चौराहे पर बैरिकेडिंग करके लोगों को प्रताड़ित कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गहरा असर देखने को मिल रहा है। दुनिया भर की मीडिया और कूटनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या पाकिस्तान एक बार फिर किसी बड़े सैन्य शासन या गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा है। वैश्विक निवेशक इस अस्थिरता को देखकर पाकिस्तान में निवेश करने से कतरा रहे हैं, जिससे वहां का विदेशी मुद्रा भंडार और अधिक संकट में आ गया है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी पाकिस्तान सरकार से अपील की है कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार का सम्मान करे और नागरिकों पर बल प्रयोग करना बंद करे। हालांकि, देश की मौजूदा हुकूमत और सैन्य तंत्र पर इन अपीलों का कोई असर होता नहीं दिख रहा है।

आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा का भविष्य क्या होगा?

जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, इस्लामाबाद और रावलपिंडी का तनावपूर्ण माहौल और अधिक गंभीर होता जा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या जनरल असीम मुनीर और मौजूदा सरकार इस विरोध प्रदर्शन को पूरी तरह कुचलने में सफल हो पाएगी, या फिर यह जनसैलाब पाकिस्तान की सत्ता में एक बड़ा भूचाल लाने में कामयाब होगा। देश के हालात जिस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि आने वाला समय पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य इतिहास के सबसे संवेदनशील अध्यायों में से एक साबित होने वाला है। जब तक सरकार बातचीत के रास्ते पर नहीं लौटती और जनता की बुनियादी मांगों को स्वीकार नहीं करती, तब तक इस उथल-पुथल से राहत मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती है।