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 क्यों डूबते और उगते सूर्य को देते हैं अर्घ्य? पढ़ें उस राजा की कहानी, जिनसे शुरू हुई छठ पूजा

जब भी छठ महापर्व का नाम आता है,तो मन में एक अलग ही श्रद्धा और भक्ति की भावना जाग उठती है। नदियों और तालाबों के किनारे लाखों व्रतियों का सैलाब,कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना,और ठेकुआ की वो मीठी महक… यह सिर्फ एक त्योहार नहीं,बल्कि एक कठिन तपस्या और अटूट आस्था का प्रतीक है।चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में’नहाय-खाय’से लेकर’खरना’और फिर लगभग36घंटों का निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखना,इसे व्रतों में सबसे कठिन बनाता है। इस पूजा में हम सूर्य देव की उपासना करते हैं,लेकिन साथ ही हम ‘छठी मैया’की भी आराधना करते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि छठी मैया हैं कौन और इस महान व्रत की शुरुआत कैसे हुई?चलिए,जानते हैं इसकी पूरी कथा।कौन हैं छठी मैया?पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,छठी मैया को लेकर दो मुख्य बातें कही जाती हैं:सूर्य देव की बहन:छठी मैया को भगवान सूर्य की बहन माना जाता है। इसीलिए छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देकर उन्हें प्रसन्न किया जाता है,ताकि छठी मैया भी प्रसन्न हों।बच्चों की रक्षक देवी:छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा जाता है,जो बच्चों की रक्षा करती हैं और उन्हें लंबी उम्र का वरदान देती हैं। आज भी जब किसी घर में बच्चे का जन्म होता है,तो छठे दिन ‘छठी’पूजी जाती है,वह इन्हीं देवी का पूजन होता है।छठ व्रत की पौराणिक कथा (Chhath Puja Vrat Katha)इस व्रत की शुरुआत की कहानी एक बहुत ही दुखी राजा से जुड़ी है। कथा के अनुसार,बहुत समय पहलेप्रियव्रतनाम के एक राजा थे। उनके पास सब कुछ था,लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। इस दुःख से राजा और उनकी पत्नी मालिनी दिन-रात घुलते रहते थे।संतान पाने के लिए राजा ने महर्षि कश्यप सेपुत्रयेष्टि यज्ञकरवाया। यज्ञ के आशीर्वाद से रानी गर्भवती तो हुईं,लेकिन नौ महीने बाद उन्होंने एक मरे हुए पुत्र को जन्म दिया।यह देखकर राजा का दिल टूट गया और वह इतने दुखी हुए कि उन्होंने आत्महत्या करने का फैसला कर लिया। जैसे ही राजा ने अपना जीवन समाप्त करने की कोशिश की,उनके सामने एक बहुत ही सुंदर,तेजस्वी देवी प्रकट हुईं।देवी ने कहा, “हे राजन! रुको। मैं षष्ठी देवी (छठी मैया) हूं। मैं ही संसार के सभी बच्चों की रक्षा करती हूं और संतानहीनों को संतान का वरदान देती हूं। जो भी मेरी पूजा सच्ची श्रद्धा और भक्ति से करता है,मैं उसकी हर मनोकामना पूरी करती हूं।”देवी ने राजा से कहा, “तुम मेरी पूजा करो,मैं तुम्हें पुत्र रत्न का वरदान दूंगी।”यह सुनकर राजा ने देवी के कहे अनुसार,कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे विधि-विधान से छठी मैया का व्रत और पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप,उन्हें एक सुंदर और स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति हुई। माना जाता है कि तभी से छठ पूजा की यह महान परंपरा शुरू हुई।एक और कथा के अनुसार,जब महाभारत में पांडव जुए में अपना सब कुछ हार गए थे,तब द्रौपदी ने भी छठ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से उनकी मनोकामना पूरी हुई और पांडवों को उनका राज-पाठ वापस मिल गया।