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गर्मियों में ही मिलते हैं आसानी से दर्शन! जानिए करौली के पानी में डूबे इस मंदिर की अनोखी कहानी

राजस्थान अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, किलों, महलों और चमत्कारी तीर्थ स्थलों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस मरुधरा की पावन भूमि पर कई ऐसे रहस्यमयी मंदिर मौजूद हैं, जिनकी आस्था और वास्तुशिल्प का विज्ञान आज भी लोगों को हैरान कर देता है। ऐसा ही एक अद्वितीय और विस्मयकारी तीर्थ स्थल राजस्थान के करौली जिले में स्थित है। यह मंदिर साल के अधिकांश महीने अथाह जलराशि के भीतर समाया रहता है। मॉनसून और सर्दियों के दौरान यह स्थान एक विशाल झील या सागर जैसा नजर आता है, जहां सिर्फ पानी ही पानी दिखता है। लेकिन जैसे ही भीषण गर्मी का मौसम आता है और तेज धूप से जलस्तर घटता है, वैसे ही यह प्राचीन देवालय अपने पूरे वैभव के साथ पानी से बाहर निकलकर श्रद्धालुओं को साक्षात दर्शन देने लगता है।

पांचना बांध की गहराइयों में समाया आस्था का अद्भुत केंद्र

करौली जिला मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित पांचना बांध (Panchna Dam) न केवल इस क्षेत्र की जीवनरेखा है, बल्कि एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांधों (Clay / Earth-fill Dams) में गिना जाता है। पांच प्रमुख नदियों—भद्रावती, बरखेड़ा, अटा, मांची और भैंसावट के संगम पर बने इस विशाल जलाशय के डूब क्षेत्र में कई प्राचीन बस्तियां और मंदिर आते हैं। इन्हीं जलमग्न मंदिरों में सबसे प्रमुख और श्रद्धा का केंद्र है भगवान शिव और स्थानीय लोक मान्यताओं से जुड़ा यह पौराणिक मंदिर।

जब पांचना बांध का निर्माण हुआ, तब आस-पास के कई पुराने गांव और प्राचीन धार्मिक स्थल जलभराव क्षेत्र की जद में आ गए। सरकार द्वारा पुनर्वास किए जाने के बावजूद स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की आस्था इन प्राचीन मंदिरों से कभी कम नहीं हुई। बारिश के दिनों में जब पांचों नदियों से पानी की आवक तेज होती है, तो यह पूरा मंदिर परिसर जलमग्न हो जाता है। उस समय मंदिर का केवल ऊपरी शिखर या ध्वज दंड ही दूर से पानी की सतह पर तैरता हुआ दिखाई देता है। बाकी पूरा गर्भगृह, सभा मंडप और परिक्रमा मार्ग कई फीट गहरे पानी में समाए रहते हैं।

भीषण गर्मियों में घटता है जलस्तर और उभरती है ऐतिहासिक संरचना

जैसे ही चैत्र और वैशाख के महीने बीतते हैं और जेठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी राजस्थान की धरती को तपाती है, वैसे ही पांचना बांध का जलस्तर धीरे-धीरे कम होने लगता है। पानी सूखने और जलस्तर के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के साथ ही यह जलमग्न मंदिर धीरे-धीरे पानी से बाहर आने लगता है। मई और जून के महीनों में जब जलस्तर बिल्कुल नीचे चला जाता है, तो मंदिर का पूरा ढांचा सतह पर स्पष्ट दिखाई देने लगता है।

यही वह विशेष समय होता है जब श्रद्धालु, इतिहासकार और दूर-दराज से आने वाले पर्यटक बिना किसी नाव या गहरे पानी के जोखिम के सीधे पैदल चलकर मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच सकते हैं। भीषण धूप और चिलचिलाती गर्मी के बावजूद इस दौरान यहां भक्तों का भारी तांता लग जाता है। श्रद्धालु इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते कि महीनों तक पानी के अथाह दबाव और नमी में रहने के बाद भी मंदिर का पत्थरों से बना ढांचा और शिवलिंग पूरी तरह अक्षुण्ण और सुरक्षित रहता है।

महीनों पानी में डूबे रहने के बाद भी सुरक्षित है प्राचीन वास्तुशिल्प

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका अद्भुत स्थापत्य और वास्तुशिल्प है। स्थानीय पत्थरों, चूने और पारंपरिक प्राचीन तकनीक से निर्मित इस मंदिर की नींव और दीवारें इतनी मजबूत हैं कि दशकों से लगातार पानी के भीतर डूबे रहने के बावजूद न तो इसमें दरारें आई हैं और न ही पत्थरों का क्षरण हुआ है।

जब गर्मियों में पानी हटता है, तो मंदिर की दीवारों पर काई और जलीय निशान जरूर दिखते हैं, लेकिन मंदिर के खंभों पर उकेरी गई सुंदर नक्काशी और मूर्तियां आज भी अपनी पुरानी चमक बिखेरती नजर आती हैं। स्थानीय ग्रामीण पानी हटते ही तुरंत इकट्ठा होकर मंदिर परिसर की सफाई करते हैं, पूजा-अर्चना शुरू की जाती है और विधिवत आरती व जलाभिषेक का क्रम प्रारंभ हो जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि स्वयं वरुण देव (जल के देवता) साल के आठ से नौ महीने इस पवित्र मंदिर और शिवलिंग का अनवरत जलाभिषेक करते हैं, और केवल कुछ समय के लिए मानव समाज को सेवा और दर्शन का अवसर सौंपते हैं।

श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और पर्यटन का उभरता केंद्र

करौली और आस-पास के जिलों—सवाई माधोपुर, भरतपुर, दौसा और धौलपुर के लोगों के लिए यह मंदिर आस्था का बहुत बड़ा केंद्र बन चुका है। गर्मियों में जब भी मंदिर पूरी तरह पानी से बाहर आता है, तो स्थानीय स्तर पर एक तरह का धार्मिक मेला सा लग जाता है। लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराने, विशेष मन्नतें मांगने और जलाभिषेक करने के लिए यहां पहुंचते हैं।

धार्मिक दृष्टि के साथ-साथ यह स्थल फोटोग्राफर्स और रोमांचक पर्यटन के शौकीनों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है। चारों तरफ फैली सूखी और नम मिट्टी, पृष्ठभूमि में फैली पांचना बांध की जलराशि और उसके बीचों-बीच सिर उठाए खड़ा प्राचीन मंदिर का विहंगम दृश्य देखने लायक होता है। शाम के समय जब ढलते सूरज की किरणें मंदिर के गुंबद पर पड़ती हैं, तो इसका सौंदर्य और भी दिव्य प्रतीत होता है। जैसे ही जुलाई-अगस्त में मॉनसून की पहली जोरदार बारिश होती है, बांध का जलस्तर फिर से बढ़ने लगता है और यह मंदिर एक बार फिर जलसमाधि ले लेता है, फिर से अगले साल की गर्मियों तक का इंतजार करने के लिए।