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गुल गुलशन गुलफाम’ के डायरेक्‍टर वेद राही का निधन

भारतीय टेलीविजन, डोगरी साहित्य और हिंदी सिनेमा के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है। 1980 और 1990 के दशक में दूरदर्शन के ऐतिहासिक धारावाहिक 'गुल गुलशन गुलफाम' के जरिए कश्मीर की हसीन वादियों, शिकारे की जिंदगी और वहां के आम लोगों की सादगीभरी जीवनशैली को पहली बार देश के हर घर के ड्राइंग रूम तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध लेखक व निर्देशक वेद राही का निधन हो गया है। उन्होंने 93 वर्ष की आयु में महाराष्ट्र के ठाणे स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य, रंगमंच और सिनेमा जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

#1. 'गुल गुलशन गुलफाम' और कश्‍मीर की अनकही दास्तान

80 के दशक के अंतिम वर्षों में जब कश्मीर की वादियां अशांति से अछूती थीं, तब दूरदर्शन पर प्रसारित हुए सीरियल 'गुल गुलशन गुलफाम' ने भारतीय टेलीविजन इतिहास में क्रांति ला दी थी। वेद राही के कुशल निर्देशन में बनी इस धारावाहिक ने डल झील के शिकारों, वहां की संस्कृति और कश्मीरी परिवारों के आपसी रिश्तों को जिस संवेदनशीलता के साथ पिरोया, उसने दर्शकों का दिल जीत लिया। इस शो के जरिए पूरी दुनिया ने पहली बार कश्मीर की आम जिंदगी और वहां के स्थानीय लोगों के सुख-दुख को बेहद नजदीक से महसूस किया था। यह धारावाहिक उस दौर में दूरदर्शन के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले शोज में से एक बनकर उभरा।

#1. डोगरी साहित्य के पुरोधा और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित

वेद राही का जन्म मई 1933 में जम्मू में हुआ था। उनके पिता मुल्क राज सराफ जम्मू-कश्मीर में पत्रकारिता के जनकों में गिने जाते थे, जिन्होंने 1924 में क्षेत्र का पहला समाचार पत्र 'रणबीर' शुरू किया था। पिता से मिले साहित्यिक संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए वेद राही ने अपनी मातृभाषा डोगरी को समृद्ध करने में अतुलनीय योगदान दिया। उनकी मशहूर रचना 'आले' (Aale) के लिए साल 1983 में उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था। साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को देखते हुए वर्ष 2024 में साहित्य अकादमी ने उन्हें अपनी सर्वोच्च फेलोशिप से भी सम्मानित किया था।

#1. हिंदी सिनेमा में अमिट छाप: 'पवित्र पापी' से लेकर 'वीर सावरकर' तक

साहित्य और टीवी सीरियलों के अलावा वेद राही का हिंदी फिल्म उद्योग में भी लंबा और सम्मानजनक करियर रहा। उन्होंने 25 से अधिक लोकप्रिय फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे। 'ये रात फिर न आएगी', 'पवित्र पापी', 'आप आए बहार आई', 'बेईमान' और 'मोम की गुड़िया' जैसी सुपर हिट फिल्मों की कहानियां और संवाद उनके कलम की ही देन थे। निर्देशन के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने 'प्रेम पर्वत' और 'काली घटा' जैसी क्लासिक फिल्मों का निर्देशन करने के साथ-साथ साल 2001 में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर आधारित ऐतिहासिक बायोपिक फिल्म 'वीर सावरकर' का निर्देशन भी किया था।

#1. साहित्य और कला जगत ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

वेद राही के निधन की खबर सामने आने के बाद साहित्य अकादमी, वरिष्ठ साहित्यकारों और फिल्म इंडस्ट्री की हस्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। साहित्य अकादमी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वेद राही जी का जाना भारतीय साहित्य, हिंदी सिनेमा और जम्मू-कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वह अपने पीछे दो बेटियां—गीतांजलि और पूनम—तथा अपने परिजनों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। ठाणे के कोपरी श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया। भले ही आज वेद राही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन 'गुल गुलशन गुलफाम' और उनकी अमर कृतियां हमेशा भारतीय दर्शकों के दिलों में जिंदा रहेंगी।