
उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी (सपा) की छवि को लेकर हमेशा से ही पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस होती रही है। खासकर 90 के दशक और उसके बाद के दौर में सपा पर लगने वाले 'गुंडई और कानून-व्यवस्था की बदहाली' के आरोपों को विपक्षी दल हर चुनाव में सबसे बड़ा हथियार बनाते हैं। वर्तमान समय में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव अपनी पार्टी को एक आधुनिक, विकासपरक और 'माई' (MY) समीकरण से आगे बढ़ाकर 'पीडीए' (PDA) के जरिए एक नई और साफ-सुथरी छवि देने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश चाहते हैं कि जनता के दिमाग से पार्टी की वो पुरानी छवि पूरी तरह मिट जाए। लेकिन इसी बीच पार्टी के कद्दावर नेता और उनके सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव (Shivpal Singh Yadav) के कुछ हालिया बयानों और रुख ने पार्टी के भीतर और बाहर एक नई बहस छेड़ दी है, जिससे ऐसा लगता है कि जहां भतीजा दाग धोने में लगा है, वहीं चाचा अनजाने में उसी पुराने जख्म को कुरेद रहे हैं।
छवि बदलने की अखिलेश यादव की छटपटाहट और नई रणनीति
साल 2012 में जब अखिलेश यादव ने यूपी के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी, तब से ही उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी की बाहुबल वाली छवि को बदलना था। उन्होंने डीपी यादव से लेकर मुख्तार अंसारी जैसे चेहरों से दूरी बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि नई समाजवादी पार्टी अपराधियों को संरक्षण नहीं देगी। हाल के वर्षों में भी अखिलेश यादव अपनी रैलियों, बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए खुद को कानून व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर मुखर रखते हैं। वह लगातार जनता को यह भरोसा दिलाने में जुटे हैं कि सपा के सत्ता में आने पर किसी भी तरह की अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उनकी यह छटपटाहट पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर और सर्वसमाज में स्वीकार्य बनाने के लिए बेहद जरूरी मानी जा रही है।
चाचा शिवपाल यादव के पुराने तेवर और बयानों से खड़ी हुई मुश्किल
एक तरफ जहां अखिलेश यादव पार्टी का कॉर्पोरेट और प्रोग्रेसिव मेकओवर करने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी राजनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले शिवपाल सिंह यादव अपने पुराने अंदाज को छोड़ नहीं पा रहे हैं। हाल के दिनों में कार्यकर्ताओं को जोश दिलाने या विपक्षियों को ललकारने के चक्कर में शिवपाल यादव के कुछ ऐसे बयान सामने आए हैं, जो सपा की उसी पुरानी कार्यशैली की याद दिलाते हैं जिसे विपक्ष 'सपा की गुंडई' कहकर प्रचारित करता रहा है। शिवपाल यादव का यह आक्रामक और पुराना ठेठ अंदाज कार्यकर्ताओं में भले ही जान फूंकता हो, लेकिन यह अखिलेश यादव की उस पूरी ब्रांडिंग पर पानी फेर देता है जो वे मध्यम वर्ग और महिला मतदाताओं के बीच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
अखिलेश यादव धो रहे हैं दाग और चाचा क्यों आमादा हैं कुरेदने पर?
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि शिवपाल यादव का पार्टी के भीतर अपना एक अलग आधार है, जो पुराने दौर की संघर्षशील और आक्रामक राजनीति से जुड़ा हुआ है। लेकिन आज की बदली हुई डिजिटल और जागरूक राजनीति में मतदाता कानून-व्यवस्था को लेकर बेहद संवेदनशील है। जब भी शिवपाल यादव या उनके गुट का कोई नेता पुराने दौर की धौंस या रसूख की भाषा बोलता है, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बैठे-बिठाए सपा पर हमला करने का मौका मिल जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि "चाचा शिवपाल जी, जब अखिलेश यादव इतनी मेहनत से पार्टी के चेहरे से 'गुंडई वाले पुराने दाग' को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप बार-बार ऐसे बयान देकर उस इतिहास को क्यों कुरेद रहे हैं?"
सपा के लिए दोहरे मोर्चे पर तालमेल बैठाना बड़ी चुनौती
समाजवादी पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक विरोधाभासों से निपटने की है। पार्टी को एक तरफ शिवपाल यादव के जमीनी और आक्रामक कार्यकर्ताओं की ऊर्जा की भी जरूरत है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव की आधुनिक और साफ-सुथरी छवि की स्वीकार्यता भी बढ़ानी है। अगर चाचा और भतीजे की राजनीति के इन दोनों छोरों के बीच सही तालमेल नहीं बैठा, तो पार्टी की छवि सुधारने की अखिलेश की मुहिम अधूरी रह जाएगी। यूपी की जनता अब विकास और सुरक्षा के मुद्दे पर वोट करती है, ऐसे में सपा नेतृत्व को यह समझना होगा कि अतीत की जिन गलतियों ने उन्हें सत्ता से दूर किया था, उन्हें बार-बार याद दिलाना उनके भविष्य की राह को और मुश्किल बना सकता है।
UK News