
पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में मूसलाधार बारिश और बादल फटने के कारण मची भयंकर बाढ़ व तबाही ने पूरे उपमहाद्वीप में चिंता की लहर दौड़ा दी है। इस प्राकृतिक त्रासदी का सबसे गंभीर और प्रत्यक्ष प्रभाव अब भारत के पड़ोसी राज्य बिहार की नदियों, विशेषकर गंडक नदी (Gandak River) पर पड़ता हुआ साफ नजर आ रहा है। नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों से अचानक छोड़े गए भारी मात्रा में पानी और पहाड़ों से बहकर आए मलबे के कारण गंडक नदी का जलस्तर खतरे के निशान को पार करने की स्थिति में पहुँच गया है, जिससे नदी के तटीय इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की धड़कनें तेज हो गई हैं। स्थिति की नज़ाकत को देखते हुए बिहार की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में भी सरगर्मी बढ़ गई है। इस आपदा से निपटने के लिए और बिहार के निचले इलाकों को जलप्रलय से बचाने के लिए विपक्षी नेताओं ने अपनी आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है, ताकि समय रहते उचित प्रबंध किए जा सकें।
तेजस्वी यादव ने जताई गंभीर चिंता, सरकार को दिए चेतावनी भरे सुझाव
बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेता तेजस्वी यादव ने नेपाल की बाढ़ त्रासदी के बाद गंडक नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित खतरे को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया और प्रेस बयानों के जरिए राज्य सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि यदि समय रहते एहतियाती कदम नहीं उठाए गए, तो वाल्मीकि नगर बराज और उसके आसपास के जिलों में भयानक बाढ़ आ सकती है, जिससे भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है। उन्होंने बिहार सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग को सलाह दी है कि वे केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर नेपाल से छोड़े जाने वाले पानी के प्रवाह पर लगातार नजर रखें और संवेदनशील तटबंधों (Embankments) की निगरानी तुरंत तेज कर दें। उनका कहना है कि इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए कागजी दावों के बजाय जमीनी स्तर पर युद्धस्तर पर काम करने की जरूरत है।
गंडक बेसिन से जुड़े तटीय जिलों में बाढ़ का मंडराता साया
नेपाल में आई इस भीषण त्रासदी के बाद बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सिवान और कुशीनगर समेत गंडक नदी के किनारे बसे दर्जनों जिलों के ग्रामीण इलाकों में भारी दहशत का माहौल बन गया है। किसानों की फसलें जो अभी पकने या तैयार होने की स्थिति में हैं, उनके डूबने का खतरा पैदा हो गया है, साथ ही निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए तैयार रहने को कहा जाने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में भी जब-जब नेपाल के पहाड़ों पर अत्यधिक बारिश हुई है, तब-तब गंडक और कोसी नदियों ने बिहार के उत्तरी हिस्सों में भारी तबाही मचाई है। यही कारण है कि इस बार स्थानीय प्रशासन भी किसी भी प्रकार की कोताही बरतने के मूड में नहीं दिख रहा है, और संवेदनशील तटबंधों पर इंजीनियरों की टीमों को तैनात कर दिया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक तैयारियों पर टिकी जनता की निगाहें
इस पूरी गंभीर स्थिति के बीच बिहार की जनता एक बार फिर से प्रशासनिक तैयारियों और बाढ़ नियंत्रण उपायों की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। तेजस्वी यादव द्वारा सरकार को दी गई सलाह के बाद अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि शासन-प्रशासन इस चुनौती से निपटने के लिए कितनी तत्परता दिखाता है। बाढ़ राहत शिविरों की व्यवस्था, नावों की उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के निर्देश दे दिए गए हैं, लेकिन धरातल पर कितनी मुस्तैदी है, यह आने वाले कुछ घंटों और दिनों का मौसम तय करेगा। नेपाल की त्रासदी ने एक बार फिर से इस बात को साबित कर दिया है कि भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के क्षेत्र में एक दीर्घकालिक व स्थाई समाधान ढूंढना कितना अनिवार्य हो चुका है, ताकि हर साल आने वाली इस प्रलय से आम जनता के जीवन को बचाया जा सके।
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