Friday , June 12 2026

पाकिस्तान की मेहनत पर फिरा पानी! ईरान-अमेरिका की सीक्रेट डील में कौन बना असली बलि का बकरा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से इस वक्त एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने पड़ोसी देश पाकिस्तान के हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। पिछले काफी समय से मध्य पूर्व में शांति बहाली और ईरान-अमेरिका के बीच तल्खी कम करने के लिए पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे से जमीन तैयार करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। पाकिस्तानी राजनयिकों ने वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक के कई चक्कर काटे और दोनों महाशक्तियों को एक मेज पर लाने की भरपूर कोशिश की। लेकिन अब जब दोनों देशों के बीच एक बड़ी सीक्रेट डील फाइनल होने की कगार पर पहुंच चुकी है, तो क्रेडिट की रेस से पाकिस्तान का नाम पूरी तरह गायब नजर आ रहा है। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इतनी दौड़-धूप करने के बाद भी पाकिस्तान इस पूरी जियोपॉलिटिकल गेम में महज 'बलि का बकरा' बनकर कैसे रह गया।

परदे के पीछे पाकिस्तान ने की थी दिन-रात एक, ऐसे बदला पूरा खेल

ग्लोबल एक्सपर्ट्स और इंटरनेशनल मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच कैदियों की अदला-बदली, फ्रीज पड़े फंड को रिलीज करने और परमाणु कार्यक्रम पर बैकचैनल वार्ताओं को शुरू कराने में पाकिस्तान की भूमिका शुरुआत में बेहद अहम थी। पाकिस्तान अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और वैश्विक मंच पर अपनी खोई हुई साख को दोबारा हासिल करने के लिए इस मध्यस्थता को एक बड़े मौके के रूप में देख रहा था। उसे उम्मीद थी कि यदि यह डील उसकी मध्यस्थता से सफल होती है, तो उसे अमेरिका और खाड़ी देशों से बड़ा आर्थिक पैकेज और कूटनीतिक मदद मिल सकती है। हालांकि, जैसे ही यह बातचीत अंतिम और निर्णायक दौर में पहुंची, इस पूरे घटनाक्रम की स्क्रिप्ट अचानक बदल गई और एक तीसरे देश ने एंट्री मार ली।

क्रेडिट की रेस में इस देश ने मारी बाजी, पाकिस्तान के हाथ लगी मायूसी

राजनयिक सूत्रों का कहना है कि जब दोनों देशों के बीच मुख्य एजेंडे पर सहमति बनने की बारी आई, तब खाड़ी क्षेत्र के ही एक अन्य प्रभावशाली और अमीर देश (जैसे कतर या ओमान) ने पूरी कमान अपने हाथों में ले ली। अंतिम दौर की गुप्त बैठकें और वित्तीय लेनदेन के रूट इसी नए मध्यस्थ देश की सरजमीं पर तय किए गए। अब जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस ऐतिहासिक समझौते की खबरें छप रही हैं, तो दुनिया भर में इसी तीसरे देश की वाहवाही हो रही है। इस पूरे परिदृश्य से पाकिस्तान का नाम और उसकी महीनों की मेहनत को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है। पाकिस्तान की हालत अब उस बेबस मददगार जैसी हो गई है जिसने शादी का पूरा इंतजाम तो किया, लेकिन सेहरा किसी और के सिर बंध गया।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने से पाकिस्तान में मचा हड़कंप

इस बड़े कूटनीतिक झटके के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय और रणनीतिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है। घरेलू स्तर पर भी शहबाज शरीफ सरकार को विपक्ष और विशेषज्ञों के कड़े तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों का कहना है कि पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी घटती विश्वसनीयता के कारण ही महाशक्तियों ने उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं जताया और अंतिम समय में उसे गेम से बाहर कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि बिना मजबूत आर्थिक और सैन्य हैसियत के अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बड़े मंचों पर केवल दौड़-धूप करने से कोई बड़ा मुकाम या क्रेडिट हासिल नहीं किया जा सकता।