Tuesday , August 18 2026

बिहार शराबबंदी पर नीतीश को मिला दुश्मन का साथ ओवैसी की पार्टी ने किया समर्थन, अपनों (NDA) ने ही खोल रखा है मोर्चा

News India Live, Digital Desk : बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर एनडीए (NDA) के भीतर जारी खींचतान के बीच AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) ने नीतीश कुमार का बचाव किया है। यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि जिस कानून को लेकर जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगी दल सवाल उठा रहे हैं, उसे ओवैसी की पार्टी ने सामाजिक हित में सही बताया है।1. ओवैसी की पार्टी का रुख (AIMIM Support)AIMIM के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और विधायक अख्तरुल इमान ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी शराबबंदी के पक्ष में है।तर्क: उन्होंने कहा कि शराब एक सामाजिक बुराई है और इससे गरीब परिवारों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। हालांकि, उन्होंने कानून के ‘कार्यान्वयन’ (Implementation) में भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए, लेकिन मूल रूप से शराबबंदी को सही ठहराया।नीतीश को सहारा: ऐसे समय में जब बीजेपी के कुछ नेता और अन्य सहयोगी दल नीतीश कुमार को घेर रहे हैं, ओवैसी की पार्टी का यह स्टैंड मुख्यमंत्री के लिए एक ‘नैतिक जीत’ की तरह देखा जा रहा है।2. अपनों ने ही खोला है मोर्चा (Conflict in NDA)नीतीश कुमार के लिए मुसीबत उनके बाहर के दुश्मन नहीं, बल्कि गठबंधन के साथी बने हुए हैं:जीतन राम मांझी (HAM): केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी कई बार कह चुके हैं कि शराबबंदी के नाम पर गरीबों को परेशान किया जा रहा है और गुजरात मॉडल की तरह सीमित छूट मिलनी चाहिए।उपेंद्र कुशवाहा (RLM): उनकी पार्टी के नेताओं का भी मानना है कि शराबबंदी केवल कागजों पर है और इससे राज्य को राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है।भाजपा का रुख: भाजपा के कुछ नेता दबी जुबान में इस कानून की समीक्षा की मांग करते रहे हैं, जिससे सरकार के भीतर मतभेद साफ झलकते हैं।3. नीतीश कुमार का संकल्पतमाम दबावों के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने फैसले पर अडिग हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि शराबबंदी से महिलाओं और बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है और इसे किसी भी कीमत पर वापस नहीं लिया जाएगा।राजनीतिक मायने:विशेषज्ञों का मानना है कि ओवैसी की पार्टी का यह समर्थन मुस्लिम मतदाताओं के बीच पैठ बनाने की रणनीति भी हो सकती है, क्योंकि शराब को इस्लाम में वर्जित माना गया है। वहीं, सहयोगी दलों का विरोध आने वाले चुनावों में सीटों के तालमेल और अपनी अहमियत बढ़ाने के लिए ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ (दबाव की रणनीति) का हिस्सा हो सकता है।