
सार्वजनिक क्षेत्र के अग्रणी बैंकों में शुमार बैंक ऑफ इंडिया (BOI) ने अपने कर्जदारों को बड़ा झटका देते हुए मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) में बढ़ोतरी की घोषणा की है। बैंक की इस कदम के बाद विभिन्न अवधियों के लिए तय बेंचमार्क दरों में इजाफा हो गया है, जिससे पर्सनल लोन, ऑटो लोन और पुराने होम लोन से जुड़े ग्राहकों की मासिक किस्त यानी ईएमआई (EMI) में सीधे बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। बैंक द्वारा अपनी उधारी दरों को रीप्राइस करने का मुख्य कारण फंड की बढ़ती लागत (Cost of Funds) और चालू तिमाही में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) को सुरक्षित रखना बताया जा रहा है। बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकिंग सेक्टर में डिपॉजिट जुटाने की होड़ और हालिया मौद्रिक समीक्षा के बाद फंड की लागत में हुई वृद्धि के चलते बैंक ऑफ इंडिया की इस पहल के बाद अब अन्य प्रमुख सरकारी व निजी बैंक भी अपनी उधारी दरों में इजाफा करने की तैयारी कर रहे हैं।
1-वर्षीय MCLR में बढ़ोतरी और होम-ऑटो लोन की ईएमआई पर सीधा असर
बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी संशोधित दरों के तहत सबसे संवेदनशील मानी जाने वाली 1 साल की एमसीएलआर दर को बढ़ाकर 8.80% तक समायोजित किया गया है। चूंकि बैंकों के अधिकांश ऑटो लोन, पर्सनल लोन और फ्लोटिंग रेट वाले रिटेल लोन्स 1 साल के एमसीएलआर बेंचमार्क से ही जुड़े (लिंक्ड) होते हैं, इसलिए इस अवधि की दर में होने वाला कोई भी इजाफा सीधे तौर पर रीसेट डेट (Reset Date) आने पर लागू हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी ग्राहक का ₹30 लाख का पुराना होम लोन या ₹10 लाख का कार लोन एमसीएलआर आधारित है, तो रीसेट चक्र पूरा होते ही उसकी मासिक ईएमआई बढ़ जाएगी या फिर बैंक लोन की कुल अवधि (Tenure) को बढ़ा देंगे। वहीं अल्पकालिक जरूरतों के लिए लिए जाने वाले ओवरनाइट, 1 महीने, 3 महीने और 6 महीने की एमसीएलआर दरों में भी समीक्षा के बाद बदलाव किया गया है, जिसका असर कॉर्पोरेट और वर्किंग कैपिटल लिमिट का उपयोग करने वाले कारोबारियों पर पड़ेगा।
क्या एसबीआई, पीएनबी और एचडीएफसी बैंक जैसे अन्य लेंडर्स भी बढ़ाएंगे ब्याज दरें?
बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जब कोई बड़ा सरकारी बैंक अपनी लेंडिंग दरों में बढ़ोतरी की शुरुआत करता है, तो यह पूरे बैंकिंग सिस्टम के लिए एक स्पष्ट संकेत होता है। मौजूदा समय में बैंकिंग प्रणाली में क्रेडिट ग्रोथ (कर्ज की मांग) के मुकाबले डिपॉजिट ग्रोथ (जमा राशि में वृद्धि) की रफ्तार अपेक्षाकृत सुस्त बनी हुई है। बैंक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर पहले से ही 7.5% से 8.0% तक का ऊंचा ब्याज दे रहे हैं, जिसके कारण बैंकों की अपनी पूंजी जुटाने की लागत लगातार बढ़ रही है। इस अंतर को पाटने के लिए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) और निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई व एचडीएफसी बैंक भी आने वाले हफ्तों में अपनी एमसीएलआर दरों में 5 से 10 बेसिस प्वाइंट्स तक की बढ़ोतरी कर सकते हैं, जिससे त्योहारी सीजन के बाद कर्ज लेना और महंगा हो जाएगा।
एमसीएलआर (MCLR) बनाम ईबीएलआर (EBLR): किन ग्राहकों की जेब पर पड़ेगा सीधा असर?
इस पूरे मामले में यह समझना बेहद जरूरी है कि बैंक ऑफ इंडिया या किसी अन्य बैंक द्वारा एमसीएलआर बढ़ाने का असर किस श्रेणी के ग्राहकों पर होगा। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमानुसार, 1 अक्टूबर 2019 के बाद स्वीकृत किए गए सभी नए फ्लोटिंग रेट रिटेल लोन्स (जैसे होम लोन और कार लोन) एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR/RLLR) से जुड़े होते हैं, जो सीधे तौर पर आरबीआई की रेपो रेट पर आधारित होते हैं। यदि आपने अक्टूबर 2019 के बाद फ्लोटिंग होम लोन लिया है, तो बैंक की एमसीएलआर बढ़ने से आपकी ईएमआई पर सीधे तुरंत असर नहीं पड़ेगा, जब तक कि आरबीआई की पॉलिसी दरों में परिवर्तन न हो। लेकिन जिन पुराने ग्राहकों का लोन 2016 से 2019 के बीच स्वीकृत हुआ था और वे अभी भी एमसीएलआर व्यवस्था के तहत चल रहे हैं, उनकी ब्याज दरें रीसेट डेट आते ही बढ़ जाएंगी। इसके अलावा कॉर्पोरेट लोन और कई तरह के फिक्स्ड टेन्योर पर्सनल लोन सीधे एमसीएलआर से प्रभावित होंगे।
महंगे होते लोन के दौर में कर्जदार कैसे करें अपना वित्तीय बचाव?
बढ़ती ब्याज दरों और महंगी होती ईएमआई के इस चक्र में आम कर्जदारों को अपनी वित्तीय योजना पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। सबसे पहले ग्राहकों को अपने लोन अकाउंट का स्टेटमेंट चेक कर यह देखना चाहिए कि उनका लोन एमसीएलआर से लिंक्ड है या रेपो-लिंक्ड (EBLR) से। यदि आपका लोन अभी भी पुराने एमसीएलआर पर चल रहा है और उस पर ज्यादा ब्याज लग रहा है, तो एक मामूली कन्वर्जन फीस चुकाकर अपने मौजूदा बैंक से ही लोन को तुरंत एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) में शिफ्ट कराने के लिए आवेदन करें। दूसरा कदम यह हो सकता है कि यदि आपके पास कोई अतिरिक्त सरप्लस फंड या वार्षिक बोनस उपलब्ध है, तो उससे अपने लोन का आंशिक प्रीपेमेंट (Partial Prepayment) कर दें। मूलधन कम होने से ब्याज का भार घटेगा और ईएमआई में होने वाली बढ़ोतरी का असर आपकी मासिक बचत पर भारी नहीं पड़ेगा।
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