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भारतीय जॉब मार्केट में स्किल की अनिवार्यता पर PM Modi का बड़ा बयान, विकसित देशों के मुकाबले भारत क्यों पिछड़ा

भारतीय अर्थव्यवस्था, कॉरपोरेट सेक्टर और भर्ती बाजार में इन दिनों एक अभूतपूर्व संरचनात्मक बदलाव देखा जा रहा है। एक दौर था जब किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से स्नातक अथवा परास्नातक की डिग्री हासिल कर लेना सुरक्षित भविष्य और सुनिश्चित नौकरी की गारंटी माना जाता था, लेकिन आधुनिक तकनीक की तेज रफ्तार ने भर्ती के पुराने पैमानों को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में हर दो से तीन वर्षों के भीतर सॉफ्टवेयर, टूल्स और कार्यप्रणालियां या तो अप्रचलित हो जाती हैं या फिर उन्हें भारी तकनीकी अपग्रेडेशन की आवश्यकता पड़ती है। इसी गंभीर जमीनी हकीकत को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओं के नाम एक विशेष वीडियो संदेश जारी कर स्पष्ट शब्दों में आह्वान किया है कि केवल अकादमिक प्रमाणपत्रों के भरोसे बैठे रहने का दौर समाप्त हो चुका है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के साथ ही सीखने की यात्रा समाप्त नहीं होती, बल्कि आज के प्रतिस्पर्धी जॉब मार्केट में प्रासंगिक बने रहने के लिए युवाओं को जीवनभर लगातार खुद को री-स्किल और अप-स्किल करते रहना होगा।

भारतीय जॉब मार्केट में गहराता स्किल गैप: डिग्री बनाम व्यवहारिक ज्ञान की चुनौती

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग और चौतरफा डिजिटल क्रांति के कारण आज उद्योग जगत की प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। शीर्ष राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब नौकरी के उम्मीदवारों में केवल उनके डिग्री अंक या कॉलेज की रैंकिंग देखने के बजाय उनकी व्यावहारिक समस्या समाधान क्षमता, क्रिटिकल थिंकिंग, तकनीकी दक्षता और व्यावहारिक कौशल को प्राथमिकता दे रही हैं। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट और केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के संयुक्त आंकड़ों के अनुसार, यद्यपि देश के युवाओं की रोजगार क्षमता (Employability) में पिछले कुछ वर्षों में आंशिक सुधार दर्ज किया गया है, तथापि पारंपरिक शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और उद्योगों की वास्तविक जरूरतों के बीच एक भारी अंतर बना हुआ है। वर्तमान में स्थिति यह है कि लाखों युवा हर साल डिग्रियां लेकर इंजीनियरिंग, कॉमर्स और आर्ट्स स्ट्रीम से पास आउट हो रहे हैं, लेकिन जब वे कॉर्पोरेट फ्लोर पर कदम रखते हैं तो उनके पास वास्तविक प्रोजेक्ट्स को संभालने के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल का अभाव होता है।

भारत बनाम विकसित देश: औपचारिक कौशल प्रशिक्षण में जमीन-आसमान का फासला

नीति आयोग और विश्व बैंक की वैश्विक रिपोर्ट के आधार पर संकलित किए गए आधिकारिक आंकड़े भारत में कार्यबल की कौशल स्थिति को लेकर बेहद चौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं। जहां विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपने युवाओं को स्कूल स्तर से ही व्यावहारिक हुनर सिखाने में भारी निवेश किया है, वहीं भारत औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण के मामले में वैश्विक औसत से काफी पीछे खड़ा है:

  • दक्षिण कोरिया: 96 प्रतिशत औपचारिक रूप से प्रशिक्षित कार्यबल

  • जापान: 80 प्रतिशत औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण कवरेज

  • जर्मनी: 75 प्रतिशत कार्यबल कुशल एवं प्रमाणित

  • ब्रिटेन (UK): 68 प्रतिशत प्रशिक्षित पेशेवर

  • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): 52 प्रतिशत औपचारिक कौशल युक्त कार्यबल

  • भारत: केवल 5 प्रतिशत कार्यबल ही औपचारिक रूप से प्रमाणित व कुशल

इन आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन यह दर्शाता है कि भारत में कार्यबल का मात्र 5 प्रतिशत हिस्सा ही किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से तकनीकी या व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त है। इसके विपरीत दक्षिण कोरिया में 96% और जापान में 80% युवाओं के पास बाकायदा प्रमाणित कौशल होता है। जर्मनी की बात करें तो वहां का प्रसिद्ध 'डुअल वीईटी सिस्टम' (Dual Vocational Education and Training) हाई स्कूल स्तर के 50 प्रतिशत से अधिक छात्रों को क्लासरूम के थ्योरी लेक्चर्स के साथ-साथ सीधे औद्योगिक इकाइयों में पेड अप्रेंटिसशिप की अनिवार्य सुविधा प्रदान करता है। भारत में इसके बिल्कुल उलट सक्रिय अप्रेंटिस कुल कार्यबल का 0.5 प्रतिशत से भी कम हैं, जिसके चलते स्नातक युवाओं की रोजगार योग्यता लगभग 56 प्रतिशत के आसपास ही सिमट कर रह जाती है। वैश्विक नियोक्ता सर्वेक्षणों में लगभग 65 से 70 प्रतिशत भारतीय रिक्रूटर्स ने स्पष्ट शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें तकनीकी और सॉफ्ट स्किल्स के मामले में योग्य उम्मीदवार ढूंढने में भारी मशक्कत करनी पड़ती है।

सामाजिक दृष्टिकोण और पुराने पाठ्यक्रम: कौशल के मार्ग में सबसे बड़ी तीन रुकावटें

भारतीय समाज और शिक्षा व्यवस्था में इस गंभीर असंतुलन के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े संरचनात्मक कारण जिम्मेदार हैं। पहला सबसे बड़ा कारण सामाजिक दृष्टिकोण है; भारत में आईटीआई (ITI), पॉलिटेक्निक डिप्लोमा अथवा अन्य वोकेशनल ट्रेनिंग पाठ्यक्रमों को अक्सर अकादमिक रूप से कमजोर छात्रों का अंतिम विकल्प माना जाता है, जबकि बीए, बीकॉम या पारंपरिक बीटेक जैसी डिग्रियों को अस्वाभाविक सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। दूसरा प्रमुख कारण विश्वविद्यालयों और तकनीकी कॉलेजों के पुराने पाठ्यक्रम हैं, जो हर दो साल में बदलती मशीन लर्निंग, क्लाउड आर्किटेक्चर, डेटा एनालिटिक्स और ऑटोमेशन की रफ्तार से तालमेल बिठाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। तीसरा कारण भारतीय श्रम बाजार में असंगठित क्षेत्र का 85 प्रतिशत से अधिक का भारी दबदबा है, जहां कर्मचारी काम करते-करते हुनर तो सीख जाते हैं, लेकिन उनके पास किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मानक का कोई औपचारिक प्रमाणन नहीं होता। भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर और विकसित भारत के लक्ष्य तक ले जाने के लिए शिक्षा नीति में कौशल विकास को स्कूली स्तर से जोड़ना और युवाओं में सतत अपस्किलिंग की आदत डालना अब समय की सबसे अनिवार्य मांग बन चुका है।