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भारतीय सिनेमा की पहली बाल कलाकार: दादा साहेब फाल्के से था यह खास रिश्ता, ऐसे बनी थीं पर्दे की पहली कृष्ण

जब भी भारतीय सिनेमा (Indian Cinema) के इतिहास और इसके जनक [दादा साहेब फाल्के] (Dadasaheb Phalke) के योगदान का जिक्र होता है, तो जेहन में मूक फिल्मों (Silent Era) का वह दौर तैर जाता है जब मनोरंजन के साधनों के नाम पर सिनेमाघर नया-नया आकार ले रहे थे। आज भले ही फिल्मों में बच्चों के अभिनय और बाल कलाकारों (Child Artists) की भरमार हो, लेकिन क्या आप जानते हैं कि वह कौन महान शख्सियत थीं जिन्होंने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में पहली बार बतौर बाल कलाकार कदम रखा था और सिल्वर स्क्रीन पर अपनी कला का जादू बिखेरा था। यह कहानी है भारतीय सिनेमा की सबसे पहली बाल कलाकार [Mandakini Phalke] (मंदाकिनी फाल्के) की, जिनका भारतीय फिल्म जगत को खड़ा करने में एक बेहद अनूठा और ऐतिहासिक योगदान रहा है। सिनेमा के शुरुआती दिनों में जब समाज में अभिनय को एक अच्छा पेशा नहीं माना जाता था और महिलाओं का पर्दे पर आना तो दूर की बात थी, तब इस नन्हीं सी कलाकार ने अपनी अदाकारी से इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया था।

दादा साहेब फाल्के से क्या था गहरा पारिवारिक और पेशेवर रिश्ता

भारतीय फिल्म जगत की पहली बाल कलाकार मंदाकिनी फाल्के का संबंध सीधे तौर पर भारतीय सिनेमा के पितामह कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के से जुड़ा हुआ था। मंदाकिनी फाल्के कोई और नहीं बल्कि खुद दादा साहेब फाल्के की अपनी लाडली बेटी [Daughter of Dadasaheb Phalke] थीं। जब दादा साहेब फाल्के अपनी ऐतिहासिक मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (Raja Harishchandra) और उसके बाद आने वाली पौराणिक फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त थे, तब बाल कलाकारों की भारी कमी के कारण उन्होंने अपनी ही बेटी को फिल्मों में उतारने का साहसिक फैसला किया। उस दौर में रूढ़िवादी सामाजिक पाबंदियों के कारण कोई भी परिवार अपनी लड़कियों को कैमरे के सामने काम करने की अनुमति नहीं देता था, लेकिन दादा साहेब ने लीक से हटकर यह साबित कर दिया कि कला किसी बंधन की मोहताज नहीं होती है। अपनी बेटी को कैमरे के सामने लाकर उन्होंने एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय सिनेमा के द्वार खोल दिए और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की।

कैसे मिली भगवान 'कृष्ण' की ऐतिहासिक भूमिका और पर्दे का चमत्कार

मंदाकिनी फाल्के को भारतीय सिनेमा में पहली बार अभिनय करने का जो ऐतिहासिक अवसर मिला, वह फिल्म थी [‘कालिया मर्दन’] (Kaliya Mardan 1919)। इस मूक फिल्म में बाल कलाकार के रूप में मंदाकिनी ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके चरित्र को पर्दे पर जीवंत किया था। जब उनसे पूछा गया कि उन्हें भगवान 'कृष्ण' की यह प्रतिष्ठित भूमिका कैसे मिली, तो इतिहास के पन्नों से पता चलता है कि बाल कृष्ण के रूप में उनकी मासूमियत, फुर्ती और चेहरे के भाव इस किरदार के लिए एकदम सटीक बैठते थे। दादा साहेब फाल्के ने अपनी इस फिल्म में कृष्ण और कालिया नाग के प्रसंग को जिस खूबसूरती से पर्दे पर उकेरा था, उसमें मंदाकिनी के अभिनय ने जान फूंक दी थी। फिल्म जब सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो दर्शकों ने इस नन्हीं सी बच्ची को पर्दे पर कृष्ण के रूप में देखकर दांतों तले उंगली दबा ली थी। लोग उस दौर में इस मूक फिल्म को देखने के लिए दूर-दूर से बैलगाड़ियों में बैठकर आते थे और पर्दे पर भगवान कृष्ण के दर्शन मानकर मंदाकिनी को श्रद्धा से देखते थे।

मूक फिल्मों के दौर का कड़ा संघर्ष और शूटिंग के अनसुने किस्से

आज के आधुनिक डिजिटल युग और वीएफएक्स [VFX] से सजी फिल्मों के मुकाबले आज से एक सदी पहले यानी साल 1919 के आसपास फिल्म बनाना किसी जंग जीतने जैसा कठिन काम हुआ करता था। मंदाकिनी फाल्के ने जब 'कालिया मर्दन' की शूटिंग की थी, तब न तो कोई आधुनिक स्टूडियो थे और न ही कृत्रिम रोशनी की कोई व्यवस्था। प्राकृतिक धूप और खुले आसमान के नीचे सारा शूट किया जाता था। भगवान कृष्ण के कालिया नाग वाले दृश्य को शूट करने के लिए कई बार खतरनाक स्टंट और पानी के बीच दृश्यों को फिल्माना पड़ता था, जिसे इस छोटी सी बच्ची ने बिना किसी शिकायत के बड़े ही साहस के साथ पूरा किया। दादा साहेब फाल्के एक सख्त निर्देशक होने के साथ-साथ एक पिता भी थे, लेकिन सेट पर वे अपनी बेटी से भी एक पेशेवर कलाकार की तरह मेहनत करवाते थे। यही कारण था कि उनकी बनाई गई फिल्में तकनीकी रूप से भले ही मूक थीं, लेकिन उनमें भावनाओं का ऐसा ज्वार होता था जो सीधे दर्शकों के दिलों को छू लेता था।

भारतीय सिनेमा की नींव और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा

मंदाकिनी फाल्के का यह सफर केवल एक बच्ची का अभिनय तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारतीय सिनेमा की उस नींव का पत्थर था जिस पर आज हजारों करोड़ रुपए का यह विशाल बॉलीवुड [Bollywood] और क्षेत्रीय सिनेमा जगत खड़ा हुआ है। उन्होंने जिस दौर में कैमरा फेस किया, उस दौर में महिलाओं और बच्चों के लिए अभिनय करना सामाजिक रूप से बहुत बड़ा जोखिम माना जाता था। उनके इस अदम्य साहस और समर्पण ने समाज की रूढ़िवादी दीवारों को तोड़ा और बाद में अन्य महिलाओं के लिए भी फिल्मों में आने का रास्ता साफ किया। आज जब हम भारतीय सिनेमा के सौ से अधिक वर्षों के सफर को गर्व के साथ याद करते हैं, तो दादा साहेब फाल्के के साथ-साथ उनकी बेटी मंदाकिनी फाल्के का नाम भी उतनी ही आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाना चाहिए। उनकी यह अनसुनी और प्रेरणादायक कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आज हम जिस आधुनिक मनोरंजन का आनंद ले रहे हैं, उसे सींचने में किन महान विभूतियों ने अपना खून-पसीना एक किया था।