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मुँह से साँस लेना: क्या मुँह से साँस लेने से फेफड़ों पर असर पड़ता है? आज ही जानें

कुछ लोग कभी-कभी नाक की बजाय मुँह से साँस लेते हैं। आमतौर पर, हमारा शरीर नाक से साँस लेने के लिए बना होता है, क्योंकि नाक हवा में मौजूद धूल, कीटाणुओं और अन्य कणों को छान लेती है। लेकिन जब हमारी नाक बंद हो जाती है, हमें सर्दी-ज़ुकाम या एलर्जी हो जाती है, या हमारे साइनस बंद हो जाते हैं, तो लोग मुँह से साँस लेने लगते हैं। शुरुआत में, यह शरीर की तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है, लेकिन अगर यह आदत बार-बार या लंबे समय तक बनी रहे, तो यह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है।दिल्ली स्थित राजीव गांधी अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अजीत कुमार कहते हैं कि मुँह से साँस लेने की आदत फेफड़ों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। नाक न केवल हवा से ऑक्सीजन लेने का एक ज़रिया है, बल्कि यह एक प्राकृतिक फ़िल्टर का भी काम करती है—हवा से धूल हटाकर, हवा को नम और गर्म करके फेफड़ों तक पहुँचाती है। जब कोई व्यक्ति मुँह से साँस लेता है, तो यह प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है और बिना फ़िल्टर की हुई, ठंडी और शुष्क हवा सीधे फेफड़ों में प्रवेश करती है।इससे वायुमार्ग में जलन और सूजन हो जाती है, जिससे लगातार खांसी, गले में खराश, सांस लेने में तकलीफ, नींद में खलल और बार-बार श्वसन संक्रमण हो सकता है। यह स्थिति अस्थमा या एलर्जी से पीड़ित लोगों के लिए विशेष रूप से हानिकारक हो सकती है। सुबह के समय गला सूखना, सिरदर्द और थकान जैसी समस्याएं मुंह से सांस लेने वाले लोगों में आम हैं।इसे कैसे रोका जा सकता है?यदि आपकी नाक बंद हो गई है, तो अपनी नाक को खुला रखने के लिए गर्म पानी की भाप लें।सोते समय तकिया थोड़ा ऊंचा रखें, ताकि सांस लेने में आसानी हो।यदि आपको एलर्जी, साइनस या अन्य श्वसन संबंधी समस्याएं हैं, तो किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लें।दिन भर पर्याप्त पानी पीते रहें ताकि आपका गला सूखे नहीं।नाक से साँस लेना न केवल प्राकृतिक है, बल्कि शरीर के लिए सुरक्षित भी है। इसलिए, अगर आपको बार-बार मुँह से साँस लेने की आदत है, तो इसके कारणों का पता लगाना और उचित उपचार करवाना बहुत ज़रूरी है।