Wednesday , August 19 2026

रूस-चीन के शागिर्द की गिद्ध नजर के बीच ट्रंप ने अपने ही दोस्त को दिया बड़ा धोखा, THAAD और पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम निकले बेअसर

वैश्विक राजनीति और कूटनीति के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी सनसनीखेज हलचल मची हुई है, जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और सामरिक विश्लेषकों को गहरी सोच में डाल दिया है। अमेरिका की राजनीति के शीर्ष पर काबिज रहने वाले डोनाल्ड ट्रंप के फैसलों और रणनीतिक चालों ने एक बार फिर अपने ही सहयोगियों को गहरी संकट में ला खड़ा किया है। अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में लोहा मनवाने वाले और दुनिया के सबसे आधुनिक माने जाने वाले अमेरिकी हथियार सिस्टम यानी थाड (THAAD) और पैट्रियट (Patriot Air Defense System) की विश्वसनीयता पर अब बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का फायदा उठाने के लिए रूस और चीन के करीबी माने जाने वाले देश लगातार घात लगाए बैठे हैं और अपनी गिद्ध दृष्टि इस पूरे घटनाक्रम पर गड़ाए हुए हैं।

अमेरिकी हथियारों की चमक हुई फीकी और रक्षा जगत में मचा हड़कंप

सालों से यह दावा किया जाता रहा है कि अमेरिकी रक्षा तकनीक दुनिया में सबसे सुरक्षित और अचूक है। हालांकि, हाल ही में हुए कुछ अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और युद्धक्षेत्र के ताजा हालातों ने इस भ्रम को पूरी तरह से तोड़ दिया है। जिन देशों ने अमेरिका पर भरोसा करके करोड़ों-अरबों डॉलर खर्च करके अपने यहां पैट्रियट और थाड जैसी अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस प्रणालियां तैनात की थीं, वे अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। दुश्मन देशों के नए और सस्ते ड्रोन तथा आधुनिक मिसाइलों के हमलों के आगे इन महंगे अमेरिकी सिस्टम्स की नाकामी ने पश्चिम के रक्षा बाजार में भूचाल ला दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप के फैसलों से सहयोगियों के बीच बढ़ा अविश्वास

डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) की नीति हमेशा से ही उनके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय रही है। एक बार फिर उनके फैसलों ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका अपने सामरिक हितों के आगे किसी भी पुराने दोस्त की सुरक्षा की परवाह नहीं करता है। जब संकट का वक्त आया और सहयोगियों को वास्तविक सैन्य मदद की दरकार थी, तब अमेरिका की तरफ से या तो चुप्पी साध ली गई या फिर साजो-सामान की आपूर्ति रोक दी गई। इस प्रकार के कूटनीतिक धोखे ने पारंपरिक अमेरिकी सहयोगियों को हिला कर रख दिया है, और वे अब अपनी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करने के लिए मजबूर हो गए हैं।

रूस और चीन के शागिर्दों की रणनीतिक चाल और गिद्ध नजर

इस मची भगदड़ और अमेरिका व उसके सहयोगियों के बीच बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा फायदा रूस और चीन के खेमे को मिलता हुआ साफ नजर आ रहा है। मास्को और बीजिंग के प्रभाव वाले देश इस बात की ताक में बैठे थे कि कब अमेरिका अपने दोस्तों का साथ छोड़े और वे अपना दाव खेलें। जैसे ही अमेरिकी हथियारों की पोल खुली और पश्चिमी देशों की साख गिरी, वैसे ही रूस और चीन के शागिर्दों ने अपनी कूटनीतिक और सैन्य चालें तेज कर दी हैं। वे अब उन देशों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं जो अमेरिकी ढाल के भरोसे बैठे थे लेकिन अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

THAAD और पैट्रियट सिस्टम की কার্যকারिता पर उठे गंभीर सवाल

सैन्य और रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि पैट्रियट और थाड सिस्टम अपनी उच्च लागत के मुकाबले ज़मीनी हकीकत में उतने प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं, जितना उनका प्रचार किया जाता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, स्वार्म ड्रोन हमलों और सुपरसोनिक मिसाइलों के दौर में ये पारंपरिक डिफेंस सिस्टम कई मौकों पर नाकामयाब साबित हुए हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के देश अब अमेरिकी रक्षा उपकरणों पर आंख मूंदकर भरोसा करने से तौबा करने लगे हैं। इस तकनीकी कमजोरी के उजागर होने से अमेरिकी रक्षा कंपनियों (जैसे लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन) के शेयरों और उनकी वैश्विक मोनोपोली को भी तगड़ा झटका लगा है।

वैश्विक कूटनीति और रक्षा बाजार का बदलता हुआ नया समीकरण

इस पूरी घटना ने ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स के समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अब देश पारंपरिक महाशक्तियों के चंगुल से निकलकर अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता (Self-Reliance) की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। भारत जैसे देश जो पहले से ही 'मेक इन इंडिया' और स्वदेशी रक्षा उपकरणों पर जोर दे रहे हैं, उनका यह फैसला पूरी तरह से सही साबित हो रहा है। आने वाले समय में रक्षा बाजार का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि देश अपनी सुरक्षा के लिए किस प्रकार के भरोसेमंद और अत्याधुनिक विकल्पों को चुनते हैं, बनिस्बत इसके कि वे खोखले वादे करने वाले पश्चिमी देशों पर निर्भर रहें।