Monday , November 2 2026

सोने की कीमत में हाहाकार, 1.76 लाख रुपये से गिरकर 1.40 लाख के नीचे आया भाव

भारतीय सर्राफा बाजार और कमोडिटी मार्केट से इस समय सोने की चमक फीकी पड़ने को लेकर बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। कुछ समय पहले तक अपनी ऐतिहासिक रिकॉर्ड ऊंचाई (लगभग 1.76 लाख से 1.80 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम) पर ट्रेड कर रहा सोना अब भारी गिरावट के बाद फिसलकर 1.40 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के नीचे आ पहुंचा है। कीमती धातुओं में आई इस अचानक और भारी सुस्ती के कारण निवेशकों में हड़कंप मच गया है। सर्राफा बाजार के जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ हफ्तों में सोने के दामों में आई यह ऐतिहासिक गिरावट कोई सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और मौद्रिक नीतियों से जुड़े कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त नीतियां और ब्याज दरों का बढ़ता दबाव

सोने की कीमतों में आई इस तेज गिरावट का सबसे प्रमुख कारण अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Federal Reserve) का रुख और वैश्विक स्तर पर बढ़ती ब्याज दरें हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूत बने आंकड़ों और लेबर मार्केट के सुदृढ़ प्रदर्शन के बाद निवेशकों के बीच यह उम्मीदें तेजी से बढ़ गई हैं कि फेडरल रिजर्व आगे भी ब्याज दरों में और बढ़ोतरी कर सकता है। जब वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें ऊंची होती हैं और बॉंड यील्ड (Bond Yields) मजबूत होती है, तब निवेशक सोने जैसी बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों (Non-yielding assets) से पैसा निकालकर सुरक्षित और अधिक रिटर्न देने वाले बॉंड्स की तरफ रुख करने लगते हैं, जिससे सोने की मांग घट जाती है।

मजबूत होता डॉलर इंडेक्स और ट्रेजरी यील्ड में जबरदस्त उछाल

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) की मजबूती ने सोने की कीमतों पर सबसे बड़ा हथौड़ा चलाया है। इसके अलावा, अमेरिकी 10-साल और 30-साल के ट्रेजरी बॉंड यील्ड में ऐतिहासिक तेजी दर्ज की गई है। जब-जब डॉलर और बॉंड यील्ड मजबूत होते हैं, तब-तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले सोने की कीमतें दबाव में आ जाती हैं। चूंकि सोने का वैश्विक कारोबार डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के महंगा होने से अन्य मुद्राओं वाले देशों के लिए सोना खरीदना महंगा हो जाता है, जिससे कीमतों में भारी करेक्शन देखने को मिलता है।

कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई की बढ़ती चिंताएं

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगातार बनी अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने वैश्विक महंगाई (Inflation) की चिंताओं को फिर से हवा दे दी है। महंगाई के मोर्चे पर बढ़ते दबाव के कारण दुनिया भर के केंद्रीय बैंक मौद्रिक सख्ती (Monetary Tightening) का रुख अपनाने पर मजबूर हैं। हालांकि, पारंपरिक रूप से सोने को महंगाई के खिलाफ एक बड़ा कवच माना जाता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में ऊर्जा कीमतों के बढ़ने और केंद्रीय बैंकों के सख्त रवैये ने निवेशकों के sentiment को कमजोर किया है, जिससे बिकवाली का दबाव बढ़ गया है।

रिकॉर्ड ऊंचाई पर मुनाफावसूली (Profit Booking) और तकनीकी करेक्शन

बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सोना पिछले कुछ महीनों में लंबी और लगातार तेजी के बाद अपनी अत्यधिक खरीदी गई (Overbought) स्थिति में पहुंच गया था। जब कीमतें बहुत ज्यादा ऊपर चली जाती हैं, तो बड़े फंड हाउस, संस्थागत निवेशक और ट्रेडर्स अपने मुनाफे को सुरक्षित करने के लिए भारी मात्रा में 'प्रॉफिट बुकिंग' करना शुरू कर देते हैं। इस बिकवाली के दबाव के कारण भी कीमतों में अचानक भारी गिरावट देखने को मिली है। तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार, जब सोने के दाम महत्वपूर्ण सपोर्ट स्तरों से नीचे फिसले, तो बाजार में पैनिक बिकवाली शुरू हो गई, जिससे दाम तेजी से नीचे लुढ़क गए।

औद्योगिक मांग में सुस्ती और वैश्विक निवेशकों का बदलता रुझान

सोने के साथ-साथ चांदी और अन्य कीमती धातुओं की औद्योगिक मांग (Industrial Demand) में सुस्ती का असर भी बाजार की धारणा पर पड़ा है। दुनिया के प्रमुख बाजारों, विशेषकर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में भौतिक सोने (Physical Gold) की मांग में अपेक्षित तेजी नहीं देखी जा रही है। इसके विपरीत, निवेशक शेयर बाजार और अन्य उच्च रिटर्न वाले एसेट क्लास की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इन सभी पांच प्रमुख कारणों के संयुक्त प्रभाव के चलते सोने के भाव 1.70 लाख के ऊंचे स्तरों से गोता लगाते हुए 1.40 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के नीचे आ गए हैं, जिससे निवेशकों को अब अपनी निवेश रणनीतियों पर नए सिरे से विचार करना पड़ रहा है।