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स्वर कोकिला लता मंगेशकर का 36 साल पुराना ‘पहला’ और ‘इतिहास का एकमात्र’ गढ़वाली गीत, आज भी उत्तराखंड के पहाड़ों में गूंजती है उनकी जादुई धुन

भारतीय संगीत जगत, सुरों की दुनिया और कला के इतिहास में जब भी स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) का नाम लिया जाता है, तो आंखों के सामने एक ऐसी अलौकिक शख्सियत उभर कर आती है जिनकी आवाज ने सात दशकों से अधिक समय तक पूरी दुनिया को मंत्रमुग्ध रखा है। हिंदी, मराठी, बंगाली और तमिल समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं में अपने जीवनकाल के दौरान 30 हजार से अधिक अमर गीत गाने वालीं लता दीदी ने अपने संगीत के सफर में हर भाषा और हर संस्कृति के साथ पूरा न्याय किया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश-दुनिया में अपनी सुरीली आवाज का जादू बिखेरने वाली लता मंगेशकर ने अपने पूरे जीवन में केवल एक ही गढ़वाली गीत रिकॉर्ड किया था? यह गीत उनके करियर का न सिर्फ 'पहला' और 'इतिहास का एकमात्र' गढ़वाली गीत है, बल्कि यह आज भी उत्तराखंड के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, देवदार के जंगलों और हर घर में एक अनमोल विरासत की तरह गूंजता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि लता दीदी के इस ऐतिहासिक गढ़वाली गीत के पीछे की अनकही कहानी क्या है, यह किस फिल्म का हिस्सा था और क्यों उन्होंने इस गाने के लिए कोई पारिश्रमिक लेने से इनकार कर दिया था।

साल 1990 की प्रसिद्ध गढ़वाली फिल्म 'रैबार' का हिस्सा था यह जादुई गीत

उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पहाड़ों की सादगी और क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में साल 1990 का वह दौर बहुत खास माना जाता है, जब गढ़वाली भाषा में 'रैबार' (Raibar) नाम की एक बेहद लोकप्रिय फिल्म बनाई गई थी। गढ़वाली भाषा में 'रैबार' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'संदेश' या 'समाचार' होता है। इस फिल्म को बनाने वाले रचनाकारों के मन में यह विचार आया था कि यदि इस फिल्म में देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित गायिका लता मंगेशकर की आवाज मिल जाए, तो इस क्षेत्रीय सिनेमा को एक नई ऊंचाई और वैश्विक पहचान मिल सकती है।

फिल्म के निर्माताओं और संगीतकारों की यह इच्छा चमत्कारिक रूप से सच साबित हुई। फिल्म 'रैबार' के लिए गीतकार देवी प्रसाद सेमवाल ने खूबसूरत शब्दों की रचना की थी, और संगीतकार कुंवर सिंह बावला ने इसके संगीत को कंपोज किया था। जब यह प्रस्ताव लता मंगेशकर के पास पहुंचा, तो उन्होंने उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पहाड़ों के प्रति अपने विशेष प्रेम के चलते इस गीत को गाने के लिए तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी। यह गीत लता दीदी के पूरे जीवन का एकमात्र गढ़वाली गीत बन गया, जिसने गढ़वाल और कुमाऊं की वादियों में हमेशा के लिए अमरता हासिल कर ली।

पहाड़ों की सादगी और प्रेमिका की भावनाओं को बयां करते गीत के प्यारे बोल

उत्तराखंड के पहाड़ी सौंदर्य और लोक जीवन की खुशबू से सरोबोर इस गाने के बोल बेहद कर्णप्रिय और दिल को छू लेने वाले हैं। इस गाने के मुख्य बोल 'मन भरमैगे मेरी सुधबुद ख्वेगे सुणी तेरी बांसुरी सुर' हैं।

यह गीत मूल रूप से एक प्रेमिका द्वारा अपने प्रीतम की बांसुरी की मीठी धुन की तारीफ में गाया गया एक बहुत ही सुंदर और भावुक गीत है। गानों के शब्दों में पहाड़ों की सादगी, शुद्धता, प्रकृति से जुड़ाव और प्रेमी-प्रेमिका के बीच के पवित्र प्रेम को बेहद खूबसूरती के साथ पिरोया गया है। जब लता मंगेशकर ने अपनी सुरीली और पारदर्शी आवाज में इन गढ़वाली शब्दों को पिरोया, तो यह गाना केवल एक फिल्म का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति की सांस्कृतिक पहचान बन गया।

उत्तराखंड के कलाकारों बीना रावत और शिवेंद्र रावत पर फिल्माया गया था यह रुमानी गीत

इस ऐतिहासिक और एकमात्र गढ़वाली गाने को परदे पर बहुत ही सजीव तरीके से फिल्माया गया था। उत्तराखंड के लोकप्रिय और जाने-माने कलाकार बीना रावत और शिवेंद्र रावत पर इस खूबसूरत रुमानी गीत को फिल्माया गया था।

स्क्रीन पर बीना रावत और शिवेंद्र रावत की शानदार केमिस्ट्री, उत्तराखंड की पारंपरिक वेशभूषा, हरे-भरे पहाड़ और पृष्ठभूमि में बजती बांसुरी की धुन ने दर्शकों के दिलों को मोह लिया था। जब सिनेमाघरों में यह फिल्म और गाना रिलीज हुआ, तो पहाड़ों के लोगों ने अपनी गढ़वाली भाषा में लता दीदी की आवाज सुनकर गर्व महसूस किया। आज भी जब उत्तराखंड के गांवों में पारंपरिक उत्सव या रेडियो पर यह गाना बजता है, तो लोग पुरानी यादों में खो जाते हैं।

जब लता दीदी ने गढ़वाली गीत के लिए एक भी पैसा लेने से कर दिया था साफ इनकार

इस गीत से जुड़ा एक ऐसा किस्सा भी बेहद मशहूर है जो लता मंगेशकर के महान व्यक्तित्व, दरियादिली और कला के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है। संगीत जगत के जानकारों के अनुसार, जब लता दीदी इस गाने की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो में आईं, तो उन्होंने इस भाषा से अनजान होने के बावजूद गाने के हर एक शब्द का सही उच्चारण और उसका गहरा अर्थ बारीकी से समझा।

कहा जाता है कि लता जी ने इस रिकॉर्डिंग के लिए करीब चार घंटे का समय निकाला था और अपनी तरफ से पूरी परफेक्शन के साथ इसे गाया था। जब गाने की रिकॉर्डिंग पूरी हो गई और पारिश्रमिक (फीस) देने की बारी आई, तो लता मंगेशकर ने इस खूबसूरत गीत के लिए कोई भी फीस लेने से साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, वहां के पहाड़ों और जनता के प्रति उनके असीम प्रेम के कारण वे इस पवित्र कार्य के लिए कोई धन नहीं लेंगी। उनका यह बड़प्पन इस बात का प्रमाण है कि वे केवल एक महान गायिका ही नहीं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील इंसान भी थीं।

आज भी पहाड़ों की वादियों और दिलों में जिंदा है लता दीदी की यह अनमोल विरासत

भले ही स्वर कोकिला लता मंगेशकर आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज और उनके द्वारा गाए गए गीत हर भारतीय की धड़कनों में हमेशा के लिए बस चुके हैं।

उत्तराखंड के पहाड़ों में जब भी ठंडी हवाएं चलती हैं और दूर किसी कोने से बांसुरी की आवाज सुनाई देती है, तो लोगों के जुबां पर लता दीदी का यह 36 साल पुराना गढ़वाली गीत अपने आप आ जाता है। 'रैबार' फिल्म का यह गाना आज सिर्फ एक ऑडियो ट्रैक नहीं रहा, बल्कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर और लता मंगेशकर के साथ पहाड़ों के उस अटूट रिश्ते की अमिट निशानी बन चुका है, जो आने वाली कई पीढ़ियों तक पीढ़ियों को मंत्रमुग्ध करता रहेगा।