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हलषष्ठी व्रत पर न करें ये बड़ी गलतियां, बच्चों की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए इन नियमों का रखें खास ध्यान

सनातन धर्म और हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी का पावन व्रत अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को भारत के विभिन्न हिस्सों में हल छठ, हर छठ, ललई छठ, चंदन छठ, कमर छठ और खामर छठ जैसे तमाम नामों से जाना जाता है। भले ही इसे मनाने के तौर-तरीके क्षेत्रीय परंपराओं के आधार पर थोड़े भिन्न हो सकते हैं, लेकिन इस व्रत की मूल भावना और इसका महत्व हर जगह एक समान रहता है। माताएं अपनी संतान की उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं। इस वर्ष यह पवित्र पर्व बुधवार, 2 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। यह विशेष दिन भगवान श्री कृष्ण के बड़े भैया और हल-मूसल धारण करने वाले भगवान बलदाऊ यानी भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है, इसलिए इस दिन कुछ खास नियमों का पालन करना और कड़े निषेधों का ध्यान रखना अनिवार्य माना गया है।

हलषष्ठी व्रत के दिन क्यों वर्जित है हल से जोता हुआ अन्न खाना?

हल छठ या हलषष्ठी के व्रत का सबसे प्रमुख और कड़ा नियम इससे जुड़े खान-पान से जुड़ा हुआ है। इस दिन व्रती महिलाओं को ऐसा कोई भी अन्न या खाद्य पदार्थ खाने की सख्त मनाही होती है जो खेत में हल चलाकर या जमीन जोतकर उगाया गया हो। चूंकि इस पर्व का सीधा संबंध भगवान बलराम और उनके आयुध 'हल' से है, इसलिए इस दिन जमीन की जुताई करके पैदा किए जाने वाले अनाज, सब्जियां या कंदमूल खाने की पूरी तरह से पाबंदी होती है।

मान्यता के अनुसार, इस दिन केवल वही फल और अनाज खाए जाते हैं जो बिना जुताई के प्राकृतिक रूप से पैदा होते हैं, जैसे कि तालाबों या पानी में उगने वाले सिंघाड़े, मतीरा या अन्य जलीय फल। इसके अलावा, व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के मांसाहारी भोजन या तामसिक चीजों का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। यदि आप इस नियम का पालन पूरी निष्ठा से करती हैं, तभी आपको व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

गाय के दूध और उससे बनी चीजों का सेवन माना गया है पूरी तरह निषेध

हलषष्ठी का यह पावन पर्व भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें गौ माता और पशुधन से अत्यधिक प्रेम था। भगवान बलराम को समर्पित इस व्रत में गाय के दूध और उससे बनी किसी भी चीज का उपयोग करना पूरी तरह वर्जित माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन गाय के स्तनों से निकलने वाले संपूर्ण दूध पर केवल उसके बछड़े का अधिकार माना जाता है, क्योंकि बछड़ा ही उसका वास्तविक हकदार होता है।

यही कारण है कि हल छठ के दिन दूध, दही, मक्खन या घी जैसी गोवंश से जुड़ी किसी भी वस्तु का सेवन या उसका उपयोग पूजा-पाठ में भी नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गलती से भी गाय के दूध का प्रयोग भोजन या किसी अन्य कार्य के लिए न हो, अन्यथा व्रत खंडित हो सकता है।

बाल और नाखून काटने के साथ इन कार्यों से भी बनाएं दूरी

धार्मिक अनुष्ठानों और व्रतों के दौरान साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है, लेकिन हलषष्ठी के दिन कुछ विशेष कार्यों को करने की सख्त मनाही होती है। यदि कोई महिला इस दिन अपने बाल या नाखून काटती है, तो उसे इस उपवास का पूरा और संपूर्ण पुण्य प्राप्त नहीं होता है। इसलिए व्रत के दिन बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए।

इसके अलावा, इस दिन किसी भी हरे-भरे पेड़ या पौधे को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत इस शुभ दिन पर नया पौधा लगाना बहुत ही कल्याणकारी माना गया है। व्रती महिलाओं को इस दिन कपड़ों की सिलाई करने या सुई-धागे से जुड़े कार्य करने से भी परहेज करना चाहिए, क्योंकि इससे व्रत के नियमों पर असर पड़ता है।

झूठ बोलने और अपशब्दों के प्रयोग से व्रत का फल होता है क्षीण

व्रत और उपवास केवल खान-पान पर नियंत्रण रखने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म की पवित्रता की भी परीक्षा है। हलषष्ठी व्रत के दिन किसी भी प्रकार का झूठ बोलने से बचना चाहिए। यदि आप व्रत के दौरान असत्य बोलते हैं या किसी को धोखा देते हैं, तो न केवल आपकी पूजा का पूरा फल निष्फल हो जाता है, बल्कि इसका प्रतिकूल प्रभाव आपकी संतान के स्वास्थ्य और जीवन पर भी पड़ सकता है।

इस पवित्र दिन पर किसी भी व्यक्ति के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करने, गुस्सा करने या किसी को अपमानित करने से पूरी तरह बचना चाहिए। इसके विपरीत, इस दिन किसी भी जरूरतमंद या गरीब व्यक्ति को सताने के बजाय अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी मदद करनी चाहिए। यदि आप इन सभी आवश्यक नियमों और सावधानियों का पालन करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ हलषष्ठी का व्रत संपन्न करती हैं, तो भगवान बलराम और माता षष्ठी की कृपा से आपकी संतान को दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और खुशहाली का वरदान प्राप्त होता है।