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कोलकाता शहर इस वक्त पानी-पानी है। पिछले18सालों में सितंबर में ऐसी रिकॉर्ड-तोड़ बारिश नहीं देखी गई। दुर्गा पूजा की तैयारियां,पंडालों की सजावट,सब पर जैसे पानी फिर गया है। मौसम विभाग (IMD)तो इसके पीछे वैज्ञानिक कारण बता रहा है,लेकिन कोलकाता के लोगों की अपनी एक अलग और सदियों पुरानी मान्यता है,जो इस बारिश को एक अलग ही नजरिए से देखती है।यह मान्यता जुड़ी है एक’मौसमी राक्षस’से।पहले जानते हैं कि विज्ञान क्या कहता है?मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक,इस तबाही वाली बारिश का कारण बंगाल की खाड़ी के ऊपर बना एक कम दबाव का क्षेत्र (Low-Pressure Area)है। यह सिस्टम अपने साथ नमी से भरी भारी हवाएं ला रहा है,जो मानसून ट्रफ के साथ मिलकर कोलकाता और आसपास के इलाकों में जमकर बरस रही हैं। यह एक सामान्य मौसमी घटना है,जो इस समय अक्सर होती है।लेकिन लोगों का विश्वास क्या कहता है?अब आती है हैरान करने वाली बात। कोलकाता में सदियों से यह माना जाता रहा है कि हर साल दुर्गा पूजा के ठीक पहले’असुर’यानी राक्षस सक्रिय हो जाते हैं। यह वही समय होता है जब मां दुर्गा धरती पर आती हैं। लोककथाओं के अनुसार,जैसे मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था,वैसे ही बाकी असुर बदला लेने या पूजा में विघ्न डालने के लिए इस समय उत्पात मचाते हैं।और उनका उत्पात मचाने का तरीका क्या है?मूसलाधार बारिश!एक पुजारी,शिब शंकर चक्रवर्ती बताते हैं, “यह हर साल की कहानी है। जब भी मां के आने का समय होता है,तो असुर कुछ न कुछ गड़बड़ करने की कोशिश करते हैं। यह बारिश उसी का प्रतीक है। वे नहीं चाहते कि मां की पूजा शांति से हो।”आस्था और मौसम का अद्भुत संयोगयह कितना अद्भुत संयोग है कि जिस समय (सितंबर-अक्टूबर) बंगाल की खाड़ी में मानसून का आखिरी चरण होता है और बारिश वाले सिस्टम बनते हैं,ठीक उसी समय दुर्गा पूजा का त्योहार भी पड़ता है। विज्ञान इसे’लो-प्रेशर एरिया’कहता है और आस्था इसे’असुरों का उत्पात’।कारण चाहे जो भी हो,यह साफ है कि कोलकाता के लोगों के लिए यह बारिश सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं है। यह उनकी आस्था,उनकी परंपरा और मां दुर्गा की कहानी का एक हिस्सा है,जो हर साल उन्हें याद दिलाता है कि अच्छी और बुरी शक्तियों की लड़ाई आज भी जारी है।
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