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Dwarka Story : अपनी गदा पर बहुत मान था बलराम को, फिर हनुमान जी ने सिखाया ऐसा सबक

News India Live, Digital Desk : हम सब जानते हैं कि बलराम जी, जिन्हें प्यार से सब ‘दाऊ’ कहते थे, शारीरिक शक्ति के धनी थे। उनका मुख्य हथियार ‘हल’ और ‘मुसल’ था। वे शेषनाग के अवतार थे, इसलिए ताकत तो उनमें बेहिसाब थी। लेकिन कई बार इंसान को (या भगवान के अवतार को भी) अपनी शक्ति पर इतना भरोसा हो जाता है कि वो अहंकार का रूप ले लेता है।बलराम का बढ़ता अहंकारएक बार की बात है, द्वापर युग में बलराम जी को अपनी ताकत पर बहुत गुमान हो गया। उन्हें लगने लगा कि इस पूरी सृष्टि में उनसे ज़्यादा ताकतवर योद्धा कोई नहीं है। वे अक्सर अपनी भुजाओं के बल का बखान करने लगे। भगवान श्री कृष्ण तो अंतर्यामी थे, वे समझ गए कि दाऊ भैया के मन में अहंकार का पेड़ उग आया है और इसे जड़ से उखाड़ना ज़रूरी है। कृष्ण जी जानते थे कि यह काम उनके परम भक्त हनुमान जी से बेहतर कोई नहीं कर सकता।बगीचे में एक ‘बूढ़ा’ वानरश्री कृष्ण की योजना के अनुसार, एक दिन हनुमान जी द्वारका के एक सुंदर बगीचे में आ गए। उन्होंने अपना रूप बदलकर एक बहुत ही वृद्ध और कमज़ोर वानर का बना लिया। वे रस्ते के बीचोबीच लेट गए और राम-नाम का जाप करने लगे।जब बलराम जी वहां अपने कुछ सैनिकों और सेवकों के साथ सैर कर रहे थे, तो उनकी नज़र रास्ते में लेटे उस बूढ़े वानर पर पड़ी। बलराम जी ने सोचा, “ये मामूली वानर मेरे रास्ते में लेटा है?” उन्होंने पास जाकर बड़ी रौबीली आवाज़ में कहा, “ए वानर! उठ यहां से और रास्ता छोड़। देखता नहीं कौन आ रहा है?”पूंछ हिलाने की चुनौतीहनुमान जी ने (जो बूढ़े वानर के वेश में थे) धीरे से आँखें खोलीं और कहा, “भाई! मैं बहुत बूढ़ा हूँ। शरीर में बिल्कुल भी ताकत नहीं बची है। उठकर हटने की हिम्मत नहीं है मुझमें। अगर तुम्हें जाना ही है, तो मेरी पूंछ को हटाकर किनारे कर दो और निकल जाओ।”बलराम जी को यह सुनकर हंसी आ गई। उन्होंने सोचा, “मैं तीनों लोकों का सबसे ताकतवर योद्धा हूँ, और ये एक मामूली पूंछ हटाने की बात कर रहा है?”बलराम जी का संघर्षबलराम जी ने बड़े ही लापरवाही से, अपने बाएं हाथ से उस वानर की पूंछ को पकड़कर हटाने की कोशिश की। लेकिन, अचरज की बात! पूंछ हिली तक नहीं।बलराम जी चौक गए। उन्होंने सोचा शायद पकड़ ढीली थी। उन्होंने फिर से ज़ोर लगाया, लेकिन पूंछ ‘टस से मस’ न हुई। अब तो दाऊ भैया की नाक का सवाल बन गया। उन्होंने अपने दोनों हाथों का पूरा ज़ोर लगा दिया। उनका चेहरा लाल हो गया, माथे से पसीने की धारा बहने लगी, सांसें फूल गईं, लेकिन वह ‘मामूली’ सी दिखने वाली पूंछ अपनी जगह से एक इंच भी नहीं खिसकी।अहंकार का टूटनाबलराम जी समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नहीं हो सकता। उनकी सारी हेकड़ी, सारा घमंड पल भर में मिटटी में मिल गया। उन्होंने हाँफते हुए हाथ जोड़कर पूछा, “वानर राज, आप कौन हैं? मेरी असीम शक्ति भी आपके आगे बेकार हो गई। कृपया अपना असली परिचय दें।”तब हनुमान जी ने अपने असली रूप के दर्शन दिए। उन्होंने बलराम जी को समझाया कि शक्ति धर्म की रक्षा के लिए है, अभिमान करने के लिए नहीं। उसी वक़्त श्री कृष्ण भी वहां आ पहुंचे। बलराम जी ने अपनी गलती मानी और समझा कि अहंकार ही सबसे बड़ा शत्रु है।सीखइस कथा का सार यही है कि हम कितने भी शक्तिशाली, ज्ञानी या धनवान क्यों न हो जाएं, हमें कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए। जिस पल हम खुद को ‘सबसे बड़ा’ मानने लगते हैं, उसी पल हमारा पतन शुरू हो जाता है