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लिव-इन रिलेशनशिप पर कोर्ट का वो फैसला जिसने हर महिला को कानूनी ताकत दे दी, अब अधिकार माँगना होगा आसान

News India Live, Digital Desk: हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अगर कोई महिला किसी पुरुष के साथ लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रही है, तो उसे सुरक्षा और अधिकारों के मामले में ‘पत्नी’ जैसा ही दर्जा दिया जाना चाहिए। कोर्ट का मानना है कि महिलाओं को सामाजिक और कानूनी तौर पर अकेला या असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।आखिर कोर्ट को यह क्यों कहना पड़ा?अक्सर देखा जाता है कि कई सालों तक साथ रहने के बाद जब रिश्तों में कड़वाहट आती है, तो पुरुष कई बार जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। चूंकि कागजों पर उनकी शादी नहीं हुई होती, इसलिए महिलाएं कानूनी उलझनों में फंस जाती हैं। वे न तो आसानी से गुजारा भत्ता (Maintenance) मांग पाती हैं और न ही घरेलू हिंसा के खिलाफ ठोस तरीके से आवाज़ उठा पाती हैं।मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि कानून की मंशा पीड़ित की सुरक्षा करना है, न कि उसे तकनीकी खामियों की वजह से न्याय से वंचित रखना। यदि दो लोग पति-पत्नी की तरह समाज में रह रहे हैं, तो महिला को मिलने वाले फायदों को केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता क्योंकि उन्होंने ‘फेरे’ नहीं लिए या शादी का सर्टिफिकेट नहीं है।क्या-क्या मिलेगा अब हक?कोर्ट की इस टिप्पणी का सीधा मतलब यह है कि अगर महिला लिव-इन पार्टनर है, तो उसे निम्नलिखित कानूनों के तहत मदद मिलना आसान हो जाएगा:घरेलू हिंसा से सुरक्षा: वह उसी कानून के तहत अपनी रक्षा की गुहार लगा सकती है जो एक विवाहित महिला के लिए बना है।भरण-पोषण का अधिकार: रिश्ता टूटने या अलग होने की स्थिति में वह अपने पार्टनर से जीवन-यापन के लिए मदद मांग सकती है।कानूनी गरिमा: समाज में उनके वजूद को एक पहचान और कानूनी ढाल मिलेगी।कानून का ‘मानवीय’ पहलूहाई कोर्ट ने यहाँ “सोशल जस्टिस” यानी सामाजिक न्याय की बात की है। कोर्ट का तर्क है कि कानून को सिर्फ किताबी शब्दों में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि असल ज़िंदगी में वह लोगों के आंसू कैसे पोंछ सकता है। लंबे समय तक बने रहे लिव-इन रिश्तों को ‘शादी जैसा रिश्ता’ माना गया है ताकि भविष्य में कोई भी अपनी जिम्मेदारी से न भाग सके।एक बड़ी राहत की बातयह फैसला उन हज़ारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो किसी भी कारणवश शादी के बंधन में बंधे बिना साथ तो रह रही हैं, लेकिन अपने भविष्य को लेकर अक्सर चिंता में रहती थीं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भले ही रीति-रिवाज अलग हों, पर न्याय के तराजू में हर महिला की सुरक्षा और आत्मसम्मान बराबर है।आपकी राय?क्या आपको भी लगता है कि लिव-इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक रहने वाली महिलाओं को कानूनी तौर पर पत्नी का दर्जा और हक मिलना चाहिए? क्या यह फैसला रिश्तों में बढ़ रही असुरक्षा को खत्म करेगा? अपनी बात हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।