नई दिल्ली में एक रक्षा संवाद के दौरान सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने इतिहास के झरोखे से भारत की विदेश नीति की पड़ताल की। उन्होंने बताया कि 1954 का ‘पंचशील समझौता’ केवल एक शांति दस्तावेज नहीं था, बल्कि उसके पीछे उस समय के भारत की आर्थिक और सैन्य स्थितियां भी जिम्मेदार थीं।1. नेहरू की सोच: विकास के लिए शांति की ज़रूरतजनरल चौहान के अनुसार, आजादी के तुरंत बाद भारत एक नवजात राष्ट्र था। नेहरू का मानना था कि:आर्थिक प्राथमिकता: भारत को अपनी गरीबी मिटाने और औद्योगिकीकरण के लिए कम से कम 20-30 साल की निरंतर शांति की आवश्यकता थी।सैन्य खर्च से बचाव: यदि चीन के साथ सीमा विवाद शुरू होता, तो भारत को अपना बजट विकास के बजाय सेना पर खर्च करना पड़ता। इसलिए, उन्होंने कूटनीति के जरिए युद्ध को टालने का प्रयास किया।2. बफर जोन का खत्म होना (Tibet Factor)सीडीएस ने रेखांकित किया कि 1950 में तिब्बत पर चीन के कब्जे ने भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी थीं।सीधी सीमा: पहले तिब्बत एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में भारत और चीन के बीच था। इसके खत्म होने के बाद भारत की सीमा सीधे चीन से मिल गई।रणनीतिक दांव: नेहरू ने सोचा कि चीन के साथ दोस्ती (हिंदी-चीनी भाई-भाई) और सिद्धांतों (पंचशील) पर आधारित रिश्ता बनाकर सीमा को सुरक्षित रखा जा सकता है।3. पंचशील के 5 मूल सिद्धांतसमझौते के केंद्र में ये पांच बातें थीं, जिन्हें नेहरू ने वैश्विक शांति का आधार माना था:एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान।पारस्परिक अनाक्रमण (एक-दूसरे पर हमला न करना)।एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।समानता और पारस्परिक लाभ।शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।4. आज के संदर्भ में सबकजनरल चौहान ने कहा कि इतिहास हमें सिखाता है कि केवल समझौतों और कागजों पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।शक्ति ही शांति का आधार: उन्होंने जोर दिया कि आज का भारत ‘शांति’ चाहता है लेकिन ‘शक्ति’ के साथ। 1962 के युद्ध ने यह साबित कर दिया था कि कूटनीति तब तक सफल नहीं होती जब तक उसके पीछे मजबूत सैन्य ताकत न हो।बदली हुई रणनीति: वर्तमान में भारत ‘सक्रिय रक्षा’ (Proactive Defense) की नीति अपना रहा है, जहाँ सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास और सैन्य आधुनिकीकरण प्राथमिकता है।
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