
News India Live, Digital Desk: भारतीय राजनीति में कभी किंगमेकर की भूमिका निभाने वाला ‘वामपंथ’ (Left) आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। आगामी मई का महीना कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए किसी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं होने वाला है। एक तरफ जहां केरल में अपनी सत्ता बचाए रखने का भारी दबाव है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में खोई हुई जमीन वापस पाने की जद्दोजहद जारी है।केरल: अभेद्य दुर्ग को बचाने की चुनौती केरल एकमात्र ऐसा राज्य बचा है जहां वामपंथी सरकार सत्ता में है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ (LDF) के सामने सत्ता विरोधी लहर और विपक्षी गठबंधन यूडीएफ (UDF) की कड़ी चुनौती है। मई में होने वाले चुनावी टेस्ट में यह तय होगा कि क्या ‘लाल किला’ बरकरार रहेगा या केरल की दशकों पुरानी ‘बारी-बारी से सत्ता’ वाली परंपरा फिर से लौटेगी।पश्चिम बंगाल: क्या फिर से खिलेगा ‘लाल गुलाब’? पश्चिम बंगाल, जो कभी 34 साल तक वामपंथ का गढ़ रहा, वहां आज पार्टी अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही है। पिछले कुछ चुनावों में शून्य पर सिमटने के बाद, पार्टी अब युवा चेहरों और जमीनी मुद्दों के सहारे वापसी की कोशिश में है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस बार भी बंगाल में प्रदर्शन नहीं सुधरा, तो राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथ की प्रासंगिकता पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा।मई का महीना और राष्ट्रीय राजनीति पर असर मई के नतीजे केवल राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे। इनका सीधा असर 2026 और उसके बाद की राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा। वामपंथियों के लिए यह चुनाव केवल जीत-हार का नहीं, बल्कि यह साबित करने का है कि क्या उनका विचारधारात्मक आधार आज भी मतदाताओं को लुभाने में सक्षम है। क्या वे ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के भीतर अपनी मोलभाव करने की शक्ति बचा पाएंगे?
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