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शादीशुदा का लिव-इन रिलेशनशिप: क्या यह अधिकार है या अपराध? इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो अलग फैसलों ने बढ़ाई कानूनी बहस

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक ऐसी कानूनी उलझन खड़ी हो गई है, जिसने समाज और न्यायपालिका दोनों के सामने बड़े सवाल पैदा कर दिए हैं। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के भीतर से दो ऐसे फैसले आए हैं, जो एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत नजर आते हैं। दोनों ही मामलों में प्रेमी जोड़े शादीशुदा थे, दोनों ने अपनी जान को खतरा बताते हुए पुलिस सुरक्षा मांगी थी, लेकिन कोर्ट के दो अलग-अलग जजों ने कानून की व्याख्या अपने-अपने तरीके से की। इस विरोधाभास ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या निजी स्वतंत्रता का अधिकार वैवाहिक कानूनों से बड़ा है?पहली बेंच का तर्क: ‘वयस्कों की सुरक्षा करना राज्य का फर्ज’इस कानूनी विवाद की शुरुआत 25 मार्च को हुई। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ के सामने शाहजहांपुर का एक मामला आया। यहाँ एक 18 साल की युवती एक शादीशुदा शख्स के साथ लिव-इन में रह रही थी। युवती के परिजनों ने उस व्यक्ति पर अपहरण और फुसलाने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी।मामले की गंभीरता को देखते हुए पीठ ने स्पष्ट रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि अगर दो बालिग अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता, चाहे उनमें से कोई विवाहित ही क्यों न हो। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि ऐसे जोड़ों के जीवन की रक्षा करना राज्य का बुनियादी कर्तव्य है। अदालत ने उनकी सुरक्षा की याचिका को स्वीकार करते हुए हस्तक्षेप को गलत बताया।दूसरी बेंच का फैसला: ‘बिना तलाक लिव-इन को नहीं मिल सकती मान्यता’इस फैसले के ठीक तीन दिन बाद, 28 मार्च को एक अन्य मामले में जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने बिल्कुल विपरीत राय दी। यहाँ भी एक शादीशुदा पुरुष बिना तलाक लिए दूसरी महिला के साथ रह रहा था। जब सुरक्षा की गुहार लगाई गई, तो अदालत ने उसे ठुकरा दिया।जस्टिस सिंह ने तर्क दिया कि यदि कोई पुरुष पहले से विवाहित है, तो वह अपनी पत्नी को कानूनी रूप से तलाक दिए बिना किसी अन्य महिला के साथ ‘पति-पत्नी’ की तरह नहीं रह सकता। कोर्ट ने इसे ‘अवैध संबंध’ करार देते हुए कहा कि ऐसी याचिका को स्वीकार करना कानूनी रूप से विवाहित जीवनसाथी के अधिकारों का हनन होगा। कोर्ट के मुताबिक, व्यक्तिगत स्वतंत्रता विवाह के सामाजिक और वैधानिक ढांचे से ऊपर नहीं हो सकती।सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश और उलझनयह पहला मौका नहीं है जब लिव-इन पर अदालतों में खींचतान दिखी हो। सुप्रीम कोर्ट ने ‘एस. खुशबू बनाम कनियम्मल’ जैसे मामलों में कहा है कि वयस्कों का साथ रहना उनकी निजता (अनुच्छेद 21) का हिस्सा है और नैतिकता को कानून के जरिए थोपा नहीं जा सकता। वहीं, ‘इंद्र शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा’ केस में कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि लिव-इन को अपने आप शादी का दर्जा नहीं मिल जाता और शादीशुदा साथी के मामले में यह ‘द्वि-विवाह’ (Bigamy) के दायरे में भी आ सकता है।कानून और नैतिकता के बीच फंसा समाजदेश के अलग-अलग हाईकोर्ट भी इस पर बंटे हुए हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट इसे अक्सर पत्नी के अधिकारों का हनन मानता है, जबकि मद्रास हाईकोर्ट सहमति को प्राथमिकता देता है। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बीच का रास्ता निकालते हुए जोड़ों को सुरक्षा तो दी, लेकिन साथ ही तलाक की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश भी दिया।असली संकट उन जोड़ों के लिए है जो सामाजिक डर और ऑनर किलिंग जैसी धमकियों के बीच जी रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘रिश्ते की वैधता’ और ‘जान की सुरक्षा’ दो अलग मुद्दे होने चाहिए। भले ही कोई रिश्ता कानूनी रूप से पेचीदा हो, लेकिन किसी को हिंसा के हवाले नहीं किया जा सकता।निष्कर्ष: क्या है आगे की राह?इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन दो फैसलों ने यह साफ कर दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप और शादीशुदा अधिकारों के बीच की लकीर बहुत धुंधली है। जब तक सुप्रीम कोर्ट से कोई स्पष्ट गाइडलाइन या नया कानून नहीं आता, तब तक अदालतों के फैसले इसी तरह व्यक्तिगत सोच और कानूनी बारीकियों के बीच झूलते रहेंगे। फिलहाल तो संदेश यही है—भारत में साथी चुनना आपकी आजादी है, लेकिन कानून आपको सुरक्षा देगा या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि आपकी फाइल किस जज के सामने है।