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News India Live, Digital Desk: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि मानवीय संवेदनाओं को कूटनीतिक फाइलों में नहीं दबाया जा सकता। मामला भोडू शेख की गर्भवती बेटी के निर्वासन (Deportation) से जुड़ा है, जिस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सरकार को ‘अंतिम अवसर’ प्रदान किया है। कोर्ट की तल्खी ने यह साफ कर दिया है कि वह इस मामले में अब और देरी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।मानवीय आधार पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुखसुप्रीम कोर्ट में भोडू शेख की याचिका पर सुनवाई के दौरान जजों ने केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी जताई। मामला एक ऐसी महिला का है जो गर्भवती है और विदेशी धरती पर निर्वासन की प्रक्रिया का सामना कर रही है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब एक नागरिक के बुनियादी मानवाधिकारों और एक अजन्मे बच्चे के भविष्य की बात हो, तो प्रक्रियात्मक देरी क्यों हो रही है? जस्टिस सूर्यकांत ने सरकार को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह आखिरी बार है जब समय दिया जा रहा है, अगली बार ठोस कार्रवाई रिपोर्ट के साथ आएं।क्या है भोडू शेख और उनकी बेटी का मामला?दरअसल, यह कानूनी लड़ाई एक परिवार को टूटने से बचाने और एक गर्भवती महिला की सुरक्षा को लेकर है। भोडू शेख ने अपनी बेटी के निर्वासन को रोकने के लिए सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि महिला की शारीरिक स्थिति और सुरक्षा को देखते हुए उसे वापस भेजने का फैसला अमानवीय है। केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने जब और समय मांगा, तो पीठ ने साफ कहा कि अदालत इस तरह के संवेदनशील मामलों में अनंत काल तक इंतजार नहीं कर सकती।कूटनीति बनाम मानवाधिकार की जंगकानूनी जानकारों का मानना है कि यह केस भविष्य के लिए एक मिसाल बनेगा। सुप्रीम कोर्ट यह तय करने की कोशिश कर रहा है कि क्या निर्वासन की कठोर नीतियों को मानवीय आधार पर शिथिल किया जा सकता है, विशेषकर तब जब मामला किसी गर्भवती महिला का हो। केंद्र सरकार को अब यह स्पष्ट करना होगा कि वह इस मामले में क्या रुख अपनाती है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख मुकर्रर करते हुए सरकार को विस्तृत हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया है।
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