
News India Live, Digital Desk: अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी विदेश नीति के तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। ट्रंप ने अपने संभावित दौरों की सूची से फिलहाल पाकिस्तान का नाम काट दिया है, जिसे इस्लामाबाद के लिए एक बड़े कूटनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, दशकों की कड़वाहट को दरकिनार करते हुए अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय फोन कॉल ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ट्रंप के इस एक फैसले ने दक्षिण एशिया और मिडिल ईस्ट के समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।पाकिस्तान की उम्मीदों पर फिरा पानीपाकिस्तान की सरकार लंबे समय से डोनाल्ड ट्रंप को इस्लामाबाद आने का न्योता दे रही थी, ताकि द्विपक्षीय संबंधों में जमी बर्फ को पिघलाया जा सके। हालांकि, वाशिंगटन से आ रही खबरों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल पाकिस्तान की यात्रा उनके एजेंडे में शामिल नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की ढुलमुल नीति और भारत के साथ ट्रंप के मजबूत रिश्तों के कारण यह दूरी और बढ़ गई है। पाकिस्तान के लिए यह खबर तब आई है जब वह पहले से ही आर्थिक कंगाली और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है।ईरान के साथ ‘फोन कॉल’ डिप्लोमेसी: क्या बदलेगा इतिहास?सबसे हैरान करने वाली खबर ईरान के मोर्चे से आई है। बताया जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के बीच हाल ही में फोन पर बातचीत हुई है। ट्रंप, जो अपने पिछले कार्यकाल में ईरान पर सबसे सख्त प्रतिबंध लगाने के लिए जाने जाते थे, अब बातचीत की मेज पर लौटते दिख रहे हैं। इस कॉल को ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ और ‘डिप्लोमेसी’ का मिला-जुला रूप माना जा रहा है। क्या यह बातचीत परमाणु समझौते की दिशा में नया कदम है या सिर्फ तनाव कम करने की कोशिश, इस पर दुनिया भर के रणनीतिकारों की नजर टिकी है।ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का नया अध्यायडोनाल्ड ट्रंप का यह रुख उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को और स्पष्ट करता है। वे उन देशों के साथ सीधे संवाद को प्राथमिकता दे रहे हैं जो वैश्विक शांति या अमेरिकी हितों के लिए चुनौती बन सकते हैं, जबकि पुराने सहयोगियों को उनकी जिम्मेदारियों का अहसास करा रहे हैं। पाकिस्तान को किनारे करना और ईरान से सीधे बात करना यह दर्शाता है कि ट्रंप 2.0 में कूटनीति के पुराने ढर्रे नहीं चलेंगे। इस बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा भारत जैसे देशों को हो सकता है, जो आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका का साथ चाहते हैं।
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