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Pakistan Economic Crisis : शहबाज शरीफ ने मानी हार अमेरिका-ईरान जंग ने तोड़ी पाकिस्तान की कमर

News India Live, Digital Desk: पहले से ही पाई-पाई को मोहताज पाकिस्तान के लिए अब चौतरफा मुसीबतें खड़ी हो गई हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव (US-Iran Conflict) का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर बेहद विनाशकारी प्रभाव पड़ रहा है। शरीफ ने एक संबोधन के दौरान माना कि इस ‘महायुद्ध’ की आहट ने पाकिस्तान की आर्थिक सुधार की कोशिशों को पटरी से उतार दिया है, जिससे देश में महंगाई और कंगाली का संकट और गहरा गया है।ईरान-अमेरिका तनाव और पाकिस्तान का ‘तेल संकट’पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी ऊर्जा निर्भरता है। शहबाज शरीफ ने स्पष्ट किया कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी विवाद के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता आई है। पाकिस्तान अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और डॉलर की कमी के कारण तेल खरीदना अब उसके बस से बाहर होता जा रहा है। प्रधानमंत्री ने आशंका जताई है कि यदि यह तनाव जारी रहा, तो पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आम आदमी की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो जाएंगी, जिससे परिवहन और बिजली उत्पादन ठप हो सकता है।महंगाई का ‘एटम बम’ और जनता का गुस्सापाकिस्तान में पहले से ही महंगाई दर आसमान छू रही है, लेकिन अब वैश्विक तनाव ने इसे और हवा दे दी है। शहबाज शरीफ के इस बयान को विशेषज्ञों द्वारा जनता को आने वाले ‘आर्थिक झटके’ के लिए तैयार करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। पाकिस्तान की जनता पहले से ही बिजली बिलों और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ सड़कों पर है। प्रधानमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि विदेशी निवेश, जिसकी पाकिस्तान को सख्त जरूरत थी, अब इस क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण पीछे हट रहा है।क्या डूब जाएगी पाकिस्तान की कश्ती?शहबाज शरीफ ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से खाड़ी देशों और अमेरिका से अपील की है कि वे तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाएं। उन्होंने कहा कि “जब हाथी लड़ते हैं, तो घास ही कुचली जाती है,” और यहां पाकिस्तान उस ‘घास’ की तरह है जिसे अपनी कोई गलती न होने के बावजूद भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। आईएमएफ (IMF) के कड़े शर्तों और अब इस वैश्विक युद्ध की स्थिति ने पाकिस्तान के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। अब देखना यह है कि इस्लामाबाद इस आर्थिक सुनामी से खुद को कैसे बचाता है।