
News India Live, Digital Desk: मिडिल ईस्ट के अशांत समुद्र में पिछले कई दिनों से जारी तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दुनिया का सबसे शक्तिशाली अमेरिकी विमानवाहक पोत ‘USS जेराल्ड आर फोर्ड’ (USS Gerald R. Ford) रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज की जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास से पीछे हटने लगा है। ईरान द्वारा दी गई भीषण हमले की चेतावनी और समुद्र की ‘नाकाबंदी’ के बीच अमेरिका के इस कदम को युद्ध के खतरों को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, सवाल अब भी बरकरार है कि क्या यह शांति की शुरुआत है या किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी?होर्मुज की जलडमरूमध्य: जहां आमने-सामने थीं दो महाशक्तियांहोर्मुज की जलडमरूमध्य दुनिया का वह सबसे संकरा समुद्री रास्ता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20% हिस्सा गुजरता है। ईरान ने पिछले दिनों धमकी दी थी कि यदि अमेरिका ने अपनी सैन्य गतिविधियां कम नहीं कीं, तो वह इस रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक कर देगा। जवाब में अमेरिका ने अपने ‘फ्लोटिंग सिटी’ कहे जाने वाले जेराल्ड आर फोर्ड को वहां तैनात कर दिया था। अब इस युद्धपोत के हटने की खबर ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों और रक्षा विशेषज्ञों को राहत की सांस लेने का मौका दिया है, क्योंकि यहां जरा सी चूक ‘तीसरे विश्व युद्ध’ का कारण बन सकती थी।ईरान की नाकाबंदी और अमेरिका की रणनीतिईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने हाल ही में आधुनिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन्स का प्रदर्शन कर अमेरिका को ललकारा था। जानकारों का मानना है कि जो बाइडन प्रशासन फिलहाल ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव से बचना चाहता है, खासकर तब जब लाल सागर और गाजा पट्टी में पहले से ही मोर्चा खुला हुआ है। जेराल्ड आर फोर्ड का पीछे हटना अमेरिका की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ताकि तनाव को कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने का एक मौका दिया जा सके।क्या फिर से बढ़ेंगी तेल की कीमतें?भले ही अमेरिकी युद्धपोत पीछे हट रहा हो, लेकिन ईरान की ‘ब्लॉकबेड’ (नाकाबंदी) की धमकी अभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए तलवार की तरह लटकी हुई है। यदि होर्मुज के रास्ते में कोई भी व्यवधान आता है, तो कच्चा तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह खबर बेहद संवेदनशील है, क्योंकि हमारा तेल आयात इसी रूट पर निर्भर करता है। फिलहाल, वाशिंगटन और तेहरान के बीच पर्दे के पीछे चल रही बातचीत पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं कि क्या मिडिल ईस्ट से युद्ध के बादल छंट पाएंगे।
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