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‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ से लहलहाये बस्ती के किसानों के खेत, आधुनिक कृषि से आया नया सवेरा

भारतीय कृषि का हृदय कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में खेती-किसानी आज अपने सबसे सुनहरे और परिवर्तनकारी दौर से गुजर रही है। दशकों से जिस खेती को मौसम की दया और अंधाधुंध सिंचाई के भरोसे छोड़ दिया गया था, उसे अब आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पद्धतियों का मजबूत संबल मिल रहा है। राज्य का उद्यान विभाग ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ (च्मत क्तवच डवतम ब्तवच) के तहत सूक्ष्म सिंचाई को घर-घर पहुँचाकर जल संरक्षण और बेहतर उत्पादन का एक अनूठा कीर्तिमान रच रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का यह अहम घटक इस मूल मंत्र पर काम करता है कि पानी की हर एक बूंद का सटीक और अधिकतम उपयोग हो। इस तकनीक ने खेती के उस पुराने और भ्रामक मिथक को जड़ से समाप्त कर दिया है जिसमें माना जाता था कि खेतों को लबालब पानी से भरने पर ही अच्छी फसल प्राप्त होती है। आज उत्तर प्रदेश में ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों की बदौलत गन्ने और बागवानी जैसी नकदी फसलों में 25 से 50 प्रतिशत तक पानी की भारी बचत हो रही है। योजना की व्यापकता और सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि प्रदेश के 82 हजार से अधिक किसान ड्रिप तकनीक को पूरी आत्मीयता के साथ अपना चुके हैं। सरकार इस दिशा में लघु और सीमांत किसानों (2 हेक्टेयर तक की भूमि वाले) को ड्रिप सिस्टम लगाने पर 90 प्रतिशत तक का भारी-भरकम अनुदान दे रही है, जिससे यह महंगी तकनीक आम किसान की पहुँच में आ गई है। इस योजना का एक और क्रांतिकारी पहलू ‘फर्टीगेशन’ है, जिसमें पानी के साथ ही खाद सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचती है। इससे उर्वरक की बर्बादी रुकती है और उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत तक की शानदार वृद्धि होती है। गन्ना विभाग इसी तकनीक से 73,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में सिंचाई कर रहा है और ऊबड़-खाबड़, रेतीली या क्षारीय जमीनों पर भी आम और अमरूद के बाग लहलहा रहे हैं।
सरकारी योजनाओं की इसी संजीवनी ने जमीनी स्तर पर कैसा चमत्कार किया है, इसकी सबसे जीवंत मिसाल उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के विकासखण्ड हरैया के ग्राम कसैला में देखने को मिलती है। यहाँ के निवासी श्री विजय प्रकाश शुक्ला आज महज एक किसान नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए आधुनिक कृषि के एक सशक्त हस्ताक्षर बन चुके हैं। श्री राम फेर के पुत्र विजय प्रकाश एक बेहद साधारण और सीमित संसाधनों वाले कृषक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका जीवन उन लाखों भारतीय किसानों का प्रतिबिंब था जो पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक खेती के चक्रव्यूह में फंसे हुए थे। विजय प्रकाश जी दिन-रात अपने खेतों में हाड़-तोड़ मेहनत करते थे, लेकिन पारंपरिक तरीके से खेत में पानी भरने में न केवल भारी मात्रा में भूजल बर्बाद होता था, बल्कि ट्यूबवेल चलाने के लिए डीजल और बिजली का खर्च उनकी कमर तोड़ देता था। इसके अलावा, खुले पानी के साथ डाली गई महंगी खाद या तो बह जाती थी या जमीन के बहुत नीचे चली जाती थी, जिससे पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता था। मौसम की अनिश्चितता, खरपतवार की भरमार और हर साल बढ़ती कृषि लागत के कारण उनकी आमदनी नगण्य रह जाती थी। अक्सर उनके मन में यह निराशा घर कर जाती थी कि क्या कभी किसानी के पेशे से परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है।
इसी घोर निराशा के बीच उद्यान विभाग की एक पहल उनके जीवन में आशा की नई किरण बनकर आई। विभाग के अधिकारियों और उद्यान निरीक्षकों ने ग्राम स्तर पर संपर्क करते हुए विजय प्रकाश शुक्ला को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत ड्रिप सिंचाई (टपक सिंचाई) प्रणाली के बारे में विस्तार से जागरूक किया। शुरुआत में किसी भी आम किसान की तरह उनके मन में भी इस नई तकनीक को लेकर कई आशंकाएं थीं। उन्हें लगता था कि पाइपों से बूंद-बूंद पानी गिरने से भला खेत कैसे सींचे जाएंगे। लेकिन विभागीय अधिकारियों ने पूरी संवेदनशीलता के साथ उन्हें ड्रिप सिंचाई के वैज्ञानिक पहलू समझाए। उन्हें बताया गया कि कैसे यह तकनीक केवल पौधों की जड़ों को नमी देती है, अनावश्यक घास-फूस को पनपने से रोकती है और सबसे बड़ी बात, इस पूरी प्रणाली को उनके खेत में स्थापित करने के लिए सरकार 90 प्रतिशत का अनुदान देगी। सरकारी सहायता के इस भरोसे ने विजय प्रकाश जी की सारी झिझक खत्म कर दी।
तकनीक और सरकारी प्रोत्साहन से लैस होकर श्री शुक्ला ने अपने 0.80 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले खेत में एक बड़ा जोखिम उठाते हुए पारंपरिक फसलों की जगह शिमला मिर्च की खेती करने का साहसिक निर्णय लिया। उनके खेत में जब ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित हुई, तो बदलाव के बीज उसी दिन बो दिए गए। 90 प्रतिशत की भारी सब्सिडी मिलने के कारण इस आधुनिक संयंत्र का आर्थिक बोझ उनके कंधों पर बिल्कुल नहीं पड़ा। ड्रिप प्रणाली चालू होते ही उन्होंने महसूस किया कि उनके खेत में पानी की खपत में 40 प्रतिशत तक की भारी कमी आ गई है। जहां पहले सिंचाई करने में कई दिन और रातें ट्यूबवेल के पानी को क्यारियों में मोड़ने में गुजर जाती थीं, वहीं अब वाल्व खोलते ही पूरे खेत के हर एक पौधे को एक समान पानी मिलने लगा। फर्टीगेशन के माध्यम से खाद सीधे जड़ों तक पहुंचने लगी, जिससे श्रम की भारी बचत हुई और फसल पूरी तरह से निरोगी और पुष्ट होकर बड़ी होने लगी।
इस आधुनिक प्रयोग ने श्री शुक्ला की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। पारंपरिक खेती में जहां प्रति एकड़ लागत लगभग 30,000 रुपये तक पहुंच जाती थी और मुनाफा अनिश्चित रहता था, वहीं ड्रिप सिंचाई ने लागत को काफी हद तक सिकोड़ दिया। शिमला मिर्च की फसल जब तैयार हुई, तो उत्पादन और गुणवत्ता देखकर हर कोई दंग रह गया। उत्पादन में सीधे तौर पर 20 से 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। उन्होंने अपने इसी छोटे से खेत से लगभग 32 कुंतल उच्च गुणवत्ता वाली शिमला मिर्च का उत्पादन किया। बाजार में इस शानदार फसल को हाथों-हाथ लिया गया और उन्हें 35 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम का बेहतरीन भाव मिला। फसल का चक्र आगे भी लाभ देता रहा और बाद में भी उन्होंने लगभग 10 कुंतल शिमला मिर्च 20 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेची। इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें प्रति एकड़ लगभग 60,000 रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त हुई। इस आय ने उनके परिवार को एक नया आर्थिक संबल दिया, पुरानी देनदारियों से मुक्त किया और उनके जीवन स्तर को पूरी तरह से ऊंचा उठा दिया।

आज विजय प्रकाश शुक्ला का खेत आसपास के दर्जनों गांवों के किसानों के लिए एक ‘ओपन एयर लेबोरेटरी’ (खुली प्रयोगशाला) बन गया है। जो किसान कल तक खेती को घाटे का सौदा मानकर पलायन की सोच रहे थे, वे आज श्री शुक्ला के लहलहाते खेतों और उनके आर्थिक उत्थान को देखकर प्रेरित हो रहे हैं। श्री शुक्ला भी अपने अनुभव सीमित नहीं रखते, बल्कि उद्यान विभाग के एक अनौपचारिक ब्रांड एंबेसडर की तरह हर किसान को ड्रिप सिंचाई और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की राह दिखाते हैं। उद्यान विभाग के निरंतर मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि यदि सरकार और किसान कदम से कदम मिलाकर चलें, तो मिट्टी से सोना उगाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ का विजन खेतों की प्यास बुझाने के साथ-साथ कृषक समाज की आर्थिक समृद्धि का एक बेहद सफल और दूरगामी मॉडल बन चुका है। बूंद-बूंद जल के सदुपयोग से लिखी जा रही यह विकास गाथा भारतीय कृषि व्यवस्था के उस सुखद भविष्य का दस्तावेज है, जहाँ किसान अभावों में नहीं जीता, बल्कि अपनी मेहनत, सरकारी योजनाओं के साथ और आधुनिक तकनीक के बल पर विकास के नए शिखर तय करता है। खेत की माटी में नवाचार के जो बीज आज बोए जा रहे हैं, वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक मजबूत, स्वावलंबी और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने का सबसे प्रामाणिक मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।