
संयुक्त राष्ट्र (UN) के सबसे शक्तिशाली मंच यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। वैश्विक कूटनीति के लिहाज से इस बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सुरक्षा परिषद के गैर-स्थायी सदस्यों की सूची में बड़ा फेरबदल हुआ है, जिसके तहत पाकिस्तान की विदाई हो गई है। वहीं दूसरी तरफ, दुनिया के पांच अलग-अलग क्षेत्रों के देशों को इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर नई जिम्मेदारी मिली है। इस पूरे चुनाव में सबसे ज्यादा ध्यान एक ऐसे मुस्लिम देश ने खींचा है, जिसने संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में पहली बार सुरक्षा परिषद की दहलीज पर कदम रखकर एक नया रिकॉर्ड कायम कर दिया है। पाकिस्तान का कार्यकाल हुआ समाप्त और पांच नए देशों को मिला मौका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश होते हैं, जिनमें से 5 स्थायी (P5) हैं और 10 गैर-स्थायी सदस्य होते हैं। इन 10 गैर-स्थायी देशों का चुनाव दो-दो साल के कार्यकाल के लिए बारी-बारी से संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा किया जाता है। हालिया चुनावी प्रक्रिया के पूरे होने के बाद अब पाकिस्तान समेत पांच पुराने देशों का दो साल का कार्यकाल समाप्त हो गया है और वे इस शक्तिशाली परिषद से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह लेने के लिए वैश्विक स्तर पर हुए गुप्त मतदान के जरिए पांच नए उभरते हुए देशों को सर्वसम्मति और भारी बहुमत से सुरक्षा परिषद का नया गैर-स्थायी सदस्य चुन लिया गया है। पहली बार इस मुस्लिम देश ने सुरक्षा परिषद में जगह बनाकर रचा इतिहास इस बार के UNSC चुनावों में जिस एक देश की जीत ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक हलकों को चौंकाया और प्रभावित किया है, वह एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मुस्लिम राष्ट्र है। संयुक्त राष्ट्र के गठन के बाद से लेकर अब तक के इतिहास में यह पहला मौका है जब इस देश को सुरक्षा परिषद के भीतर बैठकर दुनिया के बड़े फैसलों में अपनी राय रखने और वोट करने का अधिकार मिला है। वैश्विक मंचों पर इसे इस देश की बढ़ती कूटनीतिक साख और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनकी मजबूत होती पकड़ के रूप में देखा जा रहा है। इस ऐतिहासिक जीत के बाद उस देश के नागरिकों और सरकार में जश्न का माहौल है। इन पांच देशों की एंट्री से वैश्विक राजनीति के समीकरण कैसे बदलेंगे सुरक्षा परिषद में शामिल होने वाले इन पांच नए सदस्यों में अलग-अलग महाद्वीपों के देश शामिल हैं, जो अपने-अपने क्षेत्रों की भू-राजनीति (Geo-Politics) में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। जानकारों का मानना है कि इन नए देशों के आने से सुरक्षा परिषद के भीतर शक्ति संतुलन और वैश्विक मुद्दों पर होने वाली वोटिंग के समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे। रूस-यूक्रेन संकट, मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी तनाव और आतंकवाद जैसे वैश्विक मुद्दों पर अब इन नए देशों का रुख बेहद मायने रखेगा। ये देश अपने दो साल के कार्यकाल के दौरान दुनिया की महाशक्तियों के साथ मिलकर वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों पर काम करेंगे। भारत के हितों और वैश्विक कूटनीति पर इस फेरबदल का क्या होगा असर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होने वाला कोई भी फेरबदल भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से इस मंच में सुधार और खुद के लिए स्थायी सदस्यता की वकालत कर रही है। पाकिस्तान के सुरक्षा परिषद से बाहर होने के बाद अब कश्मीर मुद्दे या अन्य द्विपक्षीय मामलों को इस वैश्विक मंच पर बेवजह घसीटने की उसकी नापाक कोशिशों पर पूरी तरह से ब्रेक लग जाएगा। इसके साथ ही, सुरक्षा परिषद में एंट्री पाने वाले इन पांच नए देशों में से अधिकांश के साथ भारत के बेहद मजबूत रणनीतिक और व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में भारत उम्मीद कर रहा है कि वैश्विक मंच पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और ग्लोबल साउथ की आवाज को बुलंद करने में इन नए सहयोगियों का पूरा साथ मिलेगा।
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