Wednesday , June 10 2026

2 सीटें, 3 उम्मीदवार और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ का डर! झारखंड में उलझा राज्यसभा का गणित

2 सीटें, 3 उम्मीदवार और 'हॉर्स ट्रेडिंग' का डर! झारखंड में उलझा राज्यसभा का गणित

झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने जा रहे द्विवार्षिक चुनाव ने राज्य की सियासत में भारी गरमाहट ला दी है। चुनावी मैदान में 2 सीटों के लिए 3 बड़े सूरमाओं के उतरने से दलाल स्ट्रीट से लेकर रांची के सियासी गलियारों तक का गणित पूरी तरह उलझ गया है। सत्तारूढ़ 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की तरफ से झामुमो (JMM) के बैद्यनाथ राम और कांग्रेस (Congress) के प्रणव झा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मौजूदगी में पर्चा दाखिल कर दिया है। लेकिन खेल तब रोचक हो गया जब भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी (Parimal Nathwani) ने भी मैदान में एंट्री मार दी। नथवानी की इस सरप्राइज एंट्री के बाद से ही कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और आलाकमान के बेहद करीबी माने जाने वाले प्रणव झा की सीट संकट में फंस गई है।

सीटें दो और दावेदार तीन, ऐसे बिगड़ा पूरा समीकरण

झारखंड की विधानसभा में इस वक्त राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के कम से कम 28 वोटों (विधायकों का समर्थन) की जरूरत है। संख्या बल के हिसाब से सत्ताधारी गठबंधन के पास दोनों सीटें आसानी से जीतने का आंकड़ा मौजूद है, बशर्ते गठबंधन के सभी घटक दल पूरी तरह एकजुट रहें। झामुमो ने अपने कोटे से बैद्यनाथ राम को उतारा है, जिनके पास जेएमएम के अपने विधायकों का पर्याप्त संख्या बल मौजूद है। पेंच फंसा है दूसरी सीट पर, जहाँ कांग्रेस ने प्रणव झा को उम्मीदवार बनाया है। प्रणव झा को अपनी नैया पार लगाने के लिए न सिर्फ कांग्रेस के विधायकों, बल्कि जेएमएम के बचे हुए विधायकों, राजद (RJD) और वामपंथी दलों (CPI-ML) के समर्थन की बेहद सख्त जरूरत है।

परिमल नथवानी की एंट्री ने बढ़ाई कांग्रेस की धड़कनें

झारखंड से पहले भी दो बार निर्दलीय राज्यसभा सांसद रह चुके परिमल नथवानी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। नथवानी ने निर्दलीय पर्चा भरकर और एनडीए (NDA) का मौन या प्रत्यक्ष समर्थन हासिल कर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। भाजपा और उसके सहयोगियों के पास जितने विधायक हैं, उसके बाद भी नथवानी को जीत के लिए कुछ अतिरिक्त वोटों का इंतजाम करना होगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नथवानी की नजरें विपक्ष के साथ-साथ सत्ताधारी गठबंधन के असंतुष्ट विधायकों पर भी टिकी हैं। इसी वजह से राज्य में 'हॉर्स ट्रेडिंग' (विधायकों की खरीद-फरोख्त) और 'क्रॉस वोटिंग' की आशंकाएं तेजी से गहराने लगी हैं, जो सीधे तौर पर कांग्रेस उम्मीदवार के समीकरण को बिगाड़ सकती हैं।

सीएम हेमंत सोरेन के पाले में आई डैमेज कंट्रोल की गेंद

कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की राह में आ रही मुश्किलों को देखते हुए दिल्ली से लेकर रांची तक का कांग्रेस नेतृत्व एक्टिव हो गया है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने हाल ही में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर गठबंधन की एकजुटता सुनिश्चित करने पर लंबी चर्चा की है। हालांकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद प्रणव झा के नामांकन के समय मौजूद थे, जो यह दर्शाता है कि जेएमएम ऊपरी तौर पर कांग्रेस के साथ खड़ी है। लेकिन असली परीक्षा वोटिंग के दिन होगी, जब जेएमएम के अतिरिक्त वोट, आरजेडी के 4 और भाकपा माले के 2 विधायकों को एकजुट रखकर कांग्रेस के खाते में डलवाना होगा। अगर इस रणनीति में थोड़ी सी भी चूक हुई, तो इसका खामियाजा प्रणव झा को भुगतना पड़ सकता है।

प्रणव झा की साख दांव पर, दिल्ली की नजरें टिकीं

प्रणव झा सिर्फ एक उम्मीदवार नहीं हैं, बल्कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यालय से जुड़े हैं और पार्टी के प्रमुख मीडिया मैनेजर व राष्ट्रीय सचिव हैं। उन्हें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के करीबी कप्तानों में गिना जाता है। ऐसे में झारखंड की यह सीट जीतना कांग्रेस आलाकमान के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। यदि झारखंड के इस उलझे राजनीतिक गणित में निर्दलीय प्रत्याशी सेंध लगाने में कामयाब रहते हैं, तो यह न केवल झारखंड की गठबंधन सरकार बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका साबित होगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि 18 जून को होने वाली वोटिंग में ऊंट किस करवट बैठता है।