
मिडिल ईस्ट की राजनीति में इस वक्त एक ऐसी खबर ने हलचल मचा दी है, जिसने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। सोशल मीडिया और कुछ विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान की ओर से होने वाले किसी भी संभावित हमले या अस्थिरता को टालने के लिए एक गुप्त समझौता किया है। चर्चा है कि कैश और बेशकीमती संपत्तियों से भरा एक विमान दुबई से तेहरान पहुंचा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक कूटनीतिक मदद या व्यापारिक भुगतान का नाम दिया जा रहा है, लेकिन इसे ईरान को शांत रखने के लिए भेजी गई 'फिरौती' के रूप में देखा जा रहा है।
तेहरान एयरपोर्ट पर रहस्यमयी विमान की लैंडिंग से मची खलबली सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, हाल ही में एक निजी कार्गो विमान ने दुबई से उड़ान भरी और तेहरान के इमाम खुमैनी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर लैंड किया। इस विमान की लोडिंग और अनलोडिंग को लेकर काफी गोपनीयता बरती गई। खुफिया सूत्रों का मानना है कि इस विमान में भारी मात्रा में नकदी (Currency) मौजूद थी। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और इजरायल-ईरान के बीच जारी तनातनी को देखते हुए, यूएई किसी भी कीमत पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। माना जा रहा है कि यह 'फंड ट्रांसफर' उसी सुरक्षा गारंटी का हिस्सा है, ताकि ईरान समर्थित गुट यूएई के तेल प्रतिष्ठानों या पर्यटन केंद्रों को निशाना न बनाएं।
क्या हमलों को रोकने के लिए यूएई ने बदला अपना रुख? यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पर्यटन और विदेशी निवेश पर केंद्रित किया है। ऐसे में खाड़ी क्षेत्र में किसी भी तरह का युद्ध या मिसाइल हमला यूएई की चमक को फीका कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूएई अब 'प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी' यानी व्यावहारिक कूटनीति अपना रहा है। वह एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान जैसे ताकतवर पड़ोसी को भी नाराज नहीं करना चाहता। अगर तेहरान को भेजे गए इस फंड की खबर सच है, तो यह साफ है कि यूएई अपनी शांति खरीदने के लिए बड़ी कीमत चुकाने को तैयार है।
ईरान और यूएई के रिश्तों में नया मोड़ या मजबूरी का सौदा? ईरान इस वक्त कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और उसे अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए नकदी की सख्त जरूरत है। दूसरी ओर, यूएई की चिंता यह है कि यदि ईरान समर्थित हूतियों या अन्य समूहों ने दोबारा उन पर हमला किया, तो विदेशी निवेशक देश छोड़ सकते हैं। ऐसे में यह 'कैश डील' दोनों पक्षों के लिए फायदे का सौदा नजर आती है। हालांकि, अमेरिका जैसे पश्चिमी देशों की नजर इस ट्रांजेक्शन पर है, क्योंकि ईरान को किसी भी तरह की वित्तीय मदद देना प्रतिबंधों का उल्लंघन माना जा सकता है। आने वाले दिनों में इस रहस्यमयी 'फिरौती' को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं।
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