
वैश्विक कूटनीति के गलियारों से एक ऐसी चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है जिसने इतिहास के काले पन्नों को एक बार फिर से खोल दिया है। मध्य पूर्व में जारी तनाव को कम करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच फ्रांस के एक बेहद ऐतिहासिक लेकिन 'मनहूस' माने जाने वाले स्थान पर एक गुप्त समझौते की नींव रखी जा रही है। दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि यह वही जगह है जहां आज से ठीक 107 साल पहले एक ऐसी संधि पर दस्तखत हुए थे, जिसने आगे चलकर दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की आग में झोंक दिया और लगभग 8 करोड़ मासूम लोगों की जान ले ली। इस ऐतिहासिक संयोग ने अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या इस बदनाम जगह पर होने वाली यह नई कूटनीतिक कोशिश वाकई सफल हो पाएगी या इतिहास खुद को दोहराएगा।
वर्साय का वह काला इतिहास जिसने दुनिया को तबाह कर दिया
जिस स्थान को आज इतिहासकार और कूटनीतिक जानकार एक 'पनौती' या अशुभ जगह के रूप में देख रहे हैं, वह कोई और नहीं बल्कि फ्रांस का ऐतिहासिक वर्साय (Versailles) पैलेस है। साल 1919 में प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने के नाम पर इसी जगह पर 'वर्साय की संधि' (Treaty of Versailles) पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस समय विजेता देशों ने जर्मनी पर इतनी अपमानजनक शर्तें और भारी जुर्माना थोप दिया था, जिसने जर्मनी के भीतर प्रतिशोध की आग को भड़काया। इसी अपमान की कोख से एडॉल्फ हिटलर और नाजीवाद का जन्म हुआ, जिसने महज 20 साल बाद 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की नींव रख दी। उस महाविनाश में दुनिया भर के करीब 8 करोड़ लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, यही वजह है कि इस जगह को कूटनीति की दुनिया में बेहद विवादित माना जाता है।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति की डगर कितनी कठिन
अब इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले देश फ्रांस में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि एक टेबल पर आकर नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंधों और मध्य पूर्व में प्रॉक्सी वॉर को लेकर दोनों देशों के बीच छद्म युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है। इस नई कूटनीतिक पहल का उद्देश्य दोनों महाशक्तियों के बीच सीधे टकराव को टालना और वैश्विक तेल आपूर्ति को सुरक्षित करना है। हालांकि, दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ इस बात को लेकर बेहद आशंकित हैं कि क्या वाशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाली यह नई डील धरातल पर टिक पाएगी। अतीत में 2015 की परमाणु डील (JCPOA) का हश्र सब देख चुके हैं, जिसे अमेरिका ने बाद में एकतरफा तौर पर रद्द कर दिया था, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी हो गई थी।
क्या इतिहास के साए से बाहर निकल पाएगी यह नई कूटनीति
इस समय सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या फ्रांस की धरती पर होने वाली यह बातचीत मध्य पूर्व में स्थायी शांति का नया सवेरा लाएगी या फिर यह भी वर्साय की संधि की तरह किसी नए और बड़े वैश्विक संकट का कारण बनेगी। ईरान के भीतर कट्टरपंथियों का दबाव और अमेरिका की आंतरिक राजनीति इस डील के भविष्य को तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे। इसके साथ ही, इजरायल और सऊदी अरब जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ी भी इस कूटनीतिक हलचल पर पैनी नजर रखे हुए हैं। यदि यह समझौता पूरी तरह से दोनों पक्षों के हितों की रक्षा नहीं कर पाता, तो विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह शांति केवल कुछ समय की होगी और आने वाले दिनों में यह क्षेत्र एक नए और भयानक युद्ध की चपेट में आ सकता है।
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