
भारत और अमेरिका के रणनीतिक व व्यापारिक संबंधों के बीच एक बेहद चौंकाने वाला और चिंताजनक मोड़ सामने आया है। वैश्विक तेल बाजार और कूटनीति में तहलका मचाते हुए व्हाइट हाउस ने एक ऐसे सख्त अमेरिकी प्रतिबंध विधेयक का खुला समर्थन किया है, जिसके कानूनी रूप से लागू होने पर रूसी कच्चे तेल की लगातार खरीद को लेकर भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों पर 500 प्रतिशत तक का रिकॉर्ड-तोड़ टैरिफ (आयात शुल्क) लगाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पुष्टि की है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस के आर्थिक राजस्व को पूरी तरह ठप करने के लिए इस कड़े दंडात्मक कानून के पक्ष में आ गए हैं।
क्या है 'सेंक्शनिंग रशिया एक्ट' और भारत क्यों है इसके मुख्य निशाने पर
अमेरिकी संसद में पेश किए गए इस विवादित और बेहद आक्रामक कानून को 'सेंक्शनिंग रशिया एक्ट' (Sanctioning Russia Act) के नाम से जाना जा रहा है। इसे दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल द्वारा तैयार किया गया था। इस बिल का मूल उद्देश्य केवल रूस पर ही नहीं, बल्कि उन देशों पर भी तगड़ा आर्थिक दबाव बनाना है जो यूक्रेन युद्ध के बावजूद मास्को के ऊर्जा क्षेत्र के साथ बड़ा व्यापारिक लेनदेन कर रहे हैं। अमेरिकी सीनेट में दिए गए बयानों के मुताबिक, रूस के कुल तेल, गैस और पेट्रोलियम निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर भारत और चीन को जा रहा है, जिससे मास्को को भारी राजस्व मिल रहा है। अमेरिका का मानना है कि इस मांग पर पूरी तरह रोक लगाने से रूस आर्थिक रूप से लाचार हो जाएगा और यूक्रेन युद्ध जल्द समाप्त हो सकता है।
कानूनी ग्रे जोन में फंसा भारत: 17 जून को समाप्त हुई अमेरिकी छूट
भारत के लिए यह भू-राजनीतिक संकट इसलिए और भी ज्यादा गहरा गया है, क्योंकि बीती 17 जून 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग द्वारा दी गई वह अस्थायी विशेष छूट (Sanction Waiver) आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुकी है, जिसके तहत नई दिल्ली को बिना किसी अमेरिकी प्रतिबंध के डर के रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने की कानूनी इजाजत मिली हुई थी। इस छूट की मियाद खत्म होने के बाद से ही भारत अब एक जटिल अंतरराष्ट्रीय कानूनी ग्रे जोन में आ गया है। यदि यह नया कानून पास हो जाता है, तो यह अमेरिकी इतिहास में किसी भी राष्ट्रपति को कांग्रेस द्वारा दिया गया अब तक का सबसे व्यापक और खतरनाक 'सेकेंडरी टैरिफ' (Secondary Tariff) लगाने का अधिकार सौंप देगा।
भारतीय जीडीपी (GDP) और इन प्रमुख सेक्टर्स पर मंडराया मंदी का खतरा
अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों और वैश्विक व्यापार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने भारत पर 500 प्रतिशत का यह दंडात्मक टैरिफ लागू कर दिया, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को एक बहुत बड़ा वित्तीय झटका लगेगा। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इससे भारत की कुल जीडीपी में 0.5 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट दर्ज की जा सकती है। अमेरिका को निर्यात करने वाले भारत के सबसे मजबूत सेक्टर्स जैसे फार्मास्यूटिकल्स (दवा उद्योग), टेक्सटाइल (कपड़ा निर्यात) और आईटी (IT) सर्विसेज पर इसका सबसे विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, भारत सरकार और विदेश मंत्रालय लगातार अपने पुराने और स्वतंत्र रुख पर कायम हैं कि देश का ऊर्जा आयात पूरी तरह से उसकी राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा और घरेलू जरूरतों से प्रेरित है, जिसका किसी भी अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।
रिपब्लिकन पार्टी में ही अंतर्विरोध: वैश्विक व्यापार ठप होने की चेतावनी
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अचानक निधन के बाद इस विधेयक को अमेरिकी संसद में एक नई भावनात्मक और राजनीतिक गति मिली है, जहां कई सीनेटर इसे उनके काम के सम्मान के रूप में पारित कराने पर अड़े हैं। हालांकि, इस विधेयक को लेकर खुद अमेरिकी राजनेताओं में गहरे मतभेद उभर आए हैं। सीनेट माइनॉरिटी व्हिप डिक डर्बिन सहित कई डेमोक्रेट्स चाहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप केवल अधिकारियों के बयान के बजाय खुद सार्वजनिक रूप से इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। वहीं दूसरी ओर, खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ सीनेटर रैंड पॉल ने इस कठोर कानून का पुरजोर विरोध करते हुए चेतावनी दी है कि भारत और चीन जैसे दुनिया के सबसे बड़े बाजारों पर ऐसे दंडात्मक आर्थिक प्रतिबंध लगाने से संपूर्ण वैश्विक व्यापार चेन ध्वस्त हो जाएगी और दुनिया में एक व्यापक आर्थिक मंदी और अस्थिरता फैल सकती है।
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