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पसंद का इलाज हर नागरिक का मौलिक अधिकार’, सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील कपिल सिब्बल की तगड़ी दलील

देश के जाने-माने और दिग्गज कानूनविद् कपिल सिब्बल ने आज अदालत में एक महत्वपूर्ण मामले की पैरवी करते हुए बेहद प्रभावशाली कानूनी दलीलें पेश कीं। सिब्बल ने अदालत के समक्ष भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Life and Personal Liberty) का हवाला देते हुए साफ तौर पर कहा कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार के अंतर्गत ही स्वास्थ्य और अपनी मर्जी का इलाज चुनने का अधिकार भी शामिल है। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध या प्रशासनिक अड़चनों के कारण बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता, इसलिए इस मामले पर तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।

हाईकोर्ट का त्वरित फैसला: केस की गंभीरता को देख आज ही सुनवाई को हुआ राजी

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की तार्किक और संवैधानिक दलीलों का माननीय उच्च न्यायालय पर तत्काल असर देखने को मिला। कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता और आपातकालीन स्थिति को भांपते हुए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया और कहा कि इस याचिका पर आज ही विस्तार से सुनवाई की जाएगी। अदालत के इस अप्रत्याशित और सकारात्मक रुख से याचिकाकर्ता पक्ष को बड़ी राहत मिली है, क्योंकि अमूमन ऐसे मामलों में लंबी तारीखें मिल जाती हैं। कानूनी गलियारों में कोर्ट के इस त्वरित एक्शन की काफी सराहना की जा रही है।

इलाज चुनने की आजादी पर क्यों छिड़ी बहस? जानिए क्या है मुख्य विवाद

कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह पूरा मामला किसी वीवीआईपी या नागरिक के इलाज के लिए अस्पताल बदलने या विदेश जाने से जुड़ी प्रशासनिक बंदिशों से संबंधित है। जब प्रशासन या किसी जांच एजेंसी द्वारा इलाज के रास्ते में कानूनी अड़चनें पैदा की जाती हैं, तब मौलिक अधिकारों का यह सवाल बेहद अहम हो जाता है। कपिल सिब्बल ने इसी बिंदु को रेखांकित करते हुए अदालत को समझाया कि जब किसी व्यक्ति की सेहत और जान का सवाल हो, तो तकनीकी और कागजी नियमों को जीवन की सुरक्षा के आड़े नहीं आने देना चाहिए।

जनहित और कानूनी मोर्चे पर इस फैसले के दूरगामी मायने

हाईकोर्ट द्वारा आज ही सुनवाई करने के फैसले को एक बेहद महत्वपूर्ण नजीर (Precedent) माना जा रहा है। कानूनी विश्लेषकों का कहना है कि यह आदेश भविष्य में उन सभी नागरिकों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच बनेगा जो सरकारी नीतियों, जांच एजेंसियों के प्रतिबंधों या जेल मैनुअल के कारण अपनी पसंद का मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं ले पाते हैं। अब सबकी नजरें कोर्ट रूम में होने वाली अंतिम जिरह और न्यायाधीशों के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो देश में 'राइट टू हेल्थ' की नई परिभाषा तय कर सकता है।