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अल-नीनो का खतरनाक साया: देश के कई राज्यों में बारिश की भारी कमी से गहराया सूखे का संकट, किसानों की बढ़ी मुश्किलें – जानिए मौसम विभाग की बड़ी चेतावनी

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंसियों की हालिया रिपोर्टों ने देश की चिंता बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में सक्रिय हो रहे 'अल-नीनो' (El Nino) के प्रभाव और दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनियमित चाल के कारण देश के कई इलाकों में बारिश की भारी कमी देखने को मिल रही है। स्थिति यह है कि कई राज्यों के बड़े हिस्से सूखे के मुहाने पर खड़े नजर आ रहे हैं, जिससे न केवल आम जनजीवन बल्कि देश की कृषि अर्थव्यवस्था और अन्नदाताओं की मुश्किलें भी काफी बढ़ गई हैं। मानसून के सत्र के बीच में ही बारिश के इस तरह लंबे अंतराल (Dry Spells) और सूखे की आहट ने नीति निर्माताओं और कृषि विशेषज्ञों को गहरी चिंता में डाल दिया है।

क्या है अल-नीनो और क्यों बन रहा है यह देश के लिए बड़ा खतरा?

जलवायु विज्ञान के जानकारों के अनुसार, जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, तो इस मौसमी परिघटना को अल-नीनो कहा जाता है। इसका सीधा और नकारात्मक असर भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। अल-नीनो के कारण मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर हो जाती है, जिससे बादलों की सक्रियता कम हो जाती है और देश के कई हिस्सों में तय समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हो पाती। इस साल भी कुछ इसी तरह के मौसमी बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिसके कारण मॉनसून की रफ्तार में बार-बार रुकावट आ रही है। देश के विभिन्न हिस्सों में समय पर बारिश न होने के कारण न केवल जल स्रोतों का स्तर नीचे गिर रहा है, बल्कि भूजल का स्तर भी तेजी से घट रहा है, जो भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा संकट साबित हो सकता है।

देश के कई राज्यों में गहराता जा रहा है बारिश का संकट

आंकड़ों पर गौर करें तो देश के कई हिस्सों में सामान्य से बेहद कम बारिश दर्ज की गई है। पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर दक्षिण और मध्य भारत के कई इलाके इस बारिश की कमी का सीधा सामना कर रहे हैं। जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन सीमित हैं और जो पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर रहते हैं, वहां हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक बने हुए हैं। कई राज्यों में मानसून की शुरुआत से ही बादलों की बेरुखी देखने को मिली है, जिसके कारण जलाशयों में पानी का भंडारण भी खतरे के निशान से नीचे चल रहा है। कृषि मंत्रालय और मौसम विभाग की लगातार मॉनिटरिंग के बावजूद कई जिलों में हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं, जिससे वहां सूखा पड़ने की आशंकाएं प्रबल होती जा रही हैं।

खरीफ फसलों और कृषि पर मंडरा रहा भारी संकट

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर टिकी हुई है। ऐसे समय में जब खरीफ फसलों की बुवाई और उनकी शुरुआती वृद्धि के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, बारिश की यह भारी कमी किसानों के लिए किसी आफत से कम नहीं है। धान, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की रोपाई पर इसका सीधा असर पड़ा है। जिन इलाकों में बारिश न होने के कारण सूखे जैसे हालात बन रहे हैं, वहां के किसानों को अपनी फसलों के सूखने का डर सता रहा है। यदि आने वाले दिनों में मौसम ने करवट नहीं बदली और पर्याप्त बारिश नहीं हुई, तो कृषि उत्पादन में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है, जिसका असर देश के खाद्य बाजार और महंगाई पर भी पड़ना तय है।

कम सिंचाई वाले जिलों और ग्रामीण इलाकों की बढ़ी परेशानी

सरकारी और स्वतंत्र शोध संस्थानों के विश्लेषण के अनुसार, देश के वे जिले जहां सिंचाई कवरेज बहुत कम है और जो पूरी तरह से वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं, वे इस अल-नीनो के प्रकोप से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इन इलाकों में किसानों के पास सिंचाई के लिए वैकल्पिक साधन जैसे नलकूप या नहरों का पानी उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण वे पूरी तरह आसमान से बरसने वाली बूंदों पर आश्रित रहते हैं। जब मानसून धोखा दे जाता है, तो इन क्षेत्रों में भुखमरी, रोजगार की कमी और पलायन जैसी गंभीर सामाजिक समस्याएं सिर उठाने लगती हैं। ग्रामीण परिवारों के सामने अपने पशुओं के लिए चारे और खुद के लिए पीने के पानी का संकट भी खड़ा होने लगा है।

सरकार और प्रशासन द्वारा उठाए जा रहे कदम

इस विकट परिस्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर भी तैयारियां तेज कर दी गई हैं। कृषि और सहकारिता मंत्रालय लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और प्रभावित जिलों के लिए वैकल्पिक योजनाओं पर विचार किया जा रहा है। जिन इलाकों में सूखे का खतरा सबसे ज्यादा मंडरा रहा है, वहां किसानों को कम पानी में उगने वाली फसलों के बीज उपलब्ध कराने, त्वरित सिंचाई सुविधाओं को बहाल करने और सूखा राहत पैकेज की रूपरेखा तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा, वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को मौसम के मिजाज को देखते हुए खेती की आधुनिक तकनीक अपनाने की सलाह दी जा रही है, ताकि संभावित नुकसान को कम से कम किया जा सके।