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पुरुष नहीं, ‘स्त्री’ रूप में पूजे जाते हैं महादेव: जानिए उत्तराखंड के चमोली में स्थित रहस्यमयी लाटू देवता मंदिर का पौराणिक सच!

देवभूमि उत्तराखंड अपनी असीम प्राकृतिक सुंदरता और अलौकिक आध्यात्मिक रहस्यों के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है। यहां कदम-कदम पर ऐसे प्राचीन धाम और मंदिर स्थित हैं, जिनकी परंपराएं सामान्य सोच से बिल्कुल परे हैं। आमतौर पर भगवान शिव (महादेव) की आराधना त्रिशूलधारी, डमरूवाले औघड़दानी या शिवलिंग के रूप में की जाती है। हालांकि, उत्तराखंड के चमोली जिले के सुदूर वांण (Wan) गांव में स्थित लाटू देवता मंदिर एक ऐसा अद्भुत और रहस्यमयी तीर्थ है, जहां महादेव के स्वरूप माने जाने वाले देवता को पुरुष नहीं, बल्कि 'स्त्री' रूप (Female Form) में पूजा जाता है। इस मंदिर के कपाट केवल साल में एक दिन खुलते हैं और उस दौरान मुख्य पुजारी भी अपनी आंखों व मुंह पर पट्टी बांधकर ही गर्भगृह में प्रवेश करते हैं।

मां नंदा देवी के धर्मभाई हैं लाटू देवता: जानिए पौराणिक कथा

स्थानीय मान्यताओं और स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, लाटू देवता को भगवान शिव का ही एक गण व स्वरूप और उत्तराखंड की कुलदेवी मां नंदा देवी (पार्वती) का धर्मभाई माना जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब मां नंदा का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ और उनकी विदाई की यात्रा (राजजात) शुरू हुई, तो उनके भाई लाटू भी उनके साथ चल रहे थे। मार्ग में वांण गांव के पास लाटू देवता को बहुत तेज प्यास लगी। वे पानी की तलाश में पास के एक घर में गए, जहां एक वृद्ध महिला ने अंधेरे में पानी समझकर उन्हें मदिरा (शराब) का पात्र थमा दिया।

मदिरा का सेवन करते ही लाटू देवता अचेत और उग्र हो गए। जब माता नंदा को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने लाटू को शांत करते हुए आदेश दिया कि वे इसी स्थान पर वास करेंगे और इस पूरी घाटी के रक्षक देवता बनेंगे। माता के वरदान के अनुसार, उन्हें देवी के अर्धनारीश्वर व स्त्री भाव के साथ पूजे जाने की परंपरा स्थापित हुई।

मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य: आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर पूजा

लाटू देवता मंदिर की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मंदिर के गर्भगृह में आम भक्तों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। साल में केवल एक बार वैशाख पूर्णिमा (मई के महीने) के पावन अवसर पर मंदिर के कपाट केवल कुछ घंटों के लिए खोले जाते हैं।

  • पुजारी की आंखों पर पट्टी: मंदिर के मुख्य पुजारी गर्भगृह का दरवाजा खोलने से पहले अपनी आंखों पर मोटी काली पट्टी और मुंह पर कपड़ा बांधते हैं।

  • नागराज की चमत्कारी मणि का डर: मान्यता है कि मंदिर के गर्भगृह में लाटू देवता साक्षात शेषनाग रूपी मणिधारी नागराज के साथ वास करते हैं। उस दिव्य मणि की चमक इतनी तीव्र और अलौकिक है कि यदि कोई मनुष्य उसे खुली आंखों से देख ले, तो उसकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।

  • पवित्रता का नियम: मुंह पर पट्टी इसलिए बांधी जाती है ताकि पुजारी की सांस की हवा भी सीधे देवता की प्रतिमा या नागराज तक न पहुंचे और पूजा की शुचिता भंग न हो।

स्त्री रूप में श्रृंगार और भोग की अनोखी परंपरा

कपाट खुलने के बाद मुख्य पुजारी गर्भगृह के द्वार से केवल हाथ अंदर डालकर देवता को स्नान कराते हैं और उनका विशेष श्रृंगार करते हैं।

चूंकि यहां महादेव के इस स्वरूप की आराधना देवी स्वरूपा और सौम्य भाव में होती है, इसलिए उन्हें परंपरागत रूप से महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले आभूषण, लाल चुनरी, सुगंधित इत्र और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। गर्भगृह के बाहर खड़े होकर सैकड़ों ग्रामीण और श्रद्धालु दूर से ही हाथ जोड़कर दर्शन करते हैं। शाम होते ही कपाट पुनः एक साल के लिए विधिवत बंद कर दिए जाते हैं।

नंदा देवी राजजात यात्रा का 12वां मुख्य पड़ाव

लाटू देवता का यह मंदिर उत्तराखंड की ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध 'नंदा देवी राजजात यात्रा' (Nanda Devi Raj Jat Yatra) का 12वां महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस ऐतिहासिक पैदल यात्रा में मां नंदा की डोली जब वांण गांव पहुंचती है, तो लाटू देवता के आशीर्वाद के बाद ही यात्रा अपने सबसे कठिन और दुर्गम हिमालयी मार्ग (रूपकुंड और होमकुंड) की ओर आगे बढ़ती है।

हिमालय की गोद में बसा यह मंदिर आज भी विज्ञान और आधुनिक सोच के लिए एक अनसुलझी पहेली है, जहां आस्था, पौराणिक रहस्य और अलौकिक ऊर्जा का अनोखा संगम देखने को मिलता है।