
अमेरिका में काम करने और बसने का सपना देखने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, इंजीनियरों और अमेरिका में पढ़ रहे छात्रों को एक बड़ा झटका लग सकता है। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक नया 67-पेज का ड्राफ्ट नियम पेश किया है, जिसके तहत सालाना कैप के दायरे में आने वाले प्रत्येक नए H-1B वीजा आवेदन (Petition) पर $103,265 (लगभग 90 लाख से 1 करोड़ रुपये से अधिक) की भारी-भरकम फीस लगाने का प्रस्ताव रखा गया है।
यह नया प्रस्ताव सामान्य H-1B फाइलिंग और वैधानिक शुल्कों के अतिरिक्त होगा। चूंकि कुल H-1B वीजा में से लगभग 70% से अधिक हिस्सेदारी भारतीय पेशेवरों की होती है, ऐसे में यदि यह प्रस्ताव अंतिम कानून बनता है, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी प्रतिभाओं को हायर करना बेहद महंगा हो जाएगा।
क्या है नया प्रस्ताव और यह पिछले $100,000 नियम से कैसे अलग है?
इससे पहले सितंबर 2025 में एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर) के जरिए अमेरिका के बाहर से आने वाले H-1B कर्मचारियों पर $100,000 की अस्थाई एंट्री फीस लगाने का प्रयास किया गया था। हालांकि, उस आदेश को अमेरिकी फेडरल कोर्ट में कानूनी चुनौती मिली थी और अदालतों ने इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी।
अब नए ड्राफ्ट प्रस्ताव के जरिए प्रशासन ने एक अलग वैधानिक आधार (Statutory Authority) का उपयोग करते हुए इसे एक स्थायी नीति (Permanent Rule) के रूप में लागू करने की तैयारी की है:
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विस्तृत दायरा (Broader Scope): पुराना नियम मुख्य रूप से अमेरिका के बाहर से कॉन्सुलर प्रोसेसिंग के जरिए आने वाले लोगों पर केंद्रित था। नया $103,265 का प्रस्ताव उन सभी नए कैप-सब्जेक्ट पिटीशनों पर लागू करने की बात करता है जो सालाना लॉटरी में चुने जाएंगे।
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छात्रों पर भी असर: कानूनी जानकारों के अनुसार, इस नए नियम की जद में वे अंतरराष्ट्रीय छात्र भी आ सकते हैं जो अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद एफ-1 (F-1/OPT) वीजा से पहली बार H-1B वीजा स्टेटस में शिफ्ट होते हैं।
किन्हें मिलेगी राहत और किन पर नहीं लगेगा यह शुल्क?
प्रस्तावित नियमों के अनुसार कुछ श्रेणियों को इस विशाल शुल्क से छूट दी जा सकती है:
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कैप-एग्जम्प्ट (Cap-Exempt) संस्थान: विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षण संस्थान, गैर-लाभकारी अनुसंधान संगठन और सरकारी रिसर्च लैब्स में काम करने वाले कर्मचारियों पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
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वर्तमान H-1B एक्सटेंशन व रिन्युअल: जो कर्मचारी पहले से H-1B वीजा पर अमेरिका में कार्यरत हैं और केवल अपनी मौजूदा अवधि का एक्सटेंशन करा रहे हैं या कंपनी ट्रांसफर कर रहे हैं, उन पर आम तौर पर यह नया शुल्क लागू नहीं होगा।
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राष्ट्रीय हित (National Interest Exemption): स्वास्थ्य सेवाओं (जैसे ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर) या अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अहम क्षेत्रों के लिए छूट का प्रावधान रखा गया है।
भारतीय आईटी कंपनियों और टेक प्रोफेशनल्स पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
H-1B वीजा की सामान्य सरकारी फाइलिंग फीस आमतौर पर $2,000 से $5,000 के बीच होती है।
यदि प्रत्येक नए कर्मचारी पर करीब ₹1 करोड़ की अतिरिक्त लागत जुड़ती है, तो इसका सबसे बड़ा असर मध्यम और छोटी तकनीकी कंपनियों (Small & Medium Tech Entities) पर पड़ेगा। अमेरिकी श्रम कानूनों के तहत H-1B पिटीशन की फीस का भुगतान कंपनी (Employer) को ही करना होता है। इतनी बड़ी लागत के चलते कई कंपनियां विदेशी कर्मचारियों की नई हायरिंग रोक सकती हैं या ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के जरिए भारत जैसे देशों में ही सीधे काम आउटसोर्स करने को प्राथमिकता दे सकती हैं।
अभी सिर्फ 'ड्राफ्ट प्रस्ताव', अंतिम फैसला होना बाकी
इमिग्रेशन कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह वर्तमान में केवल एक प्रस्तावित ड्राफ्ट नियम (Proposed Rule) है। इसे फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित करने के बाद सार्वजनिक टिप्पणियों (Public Comment Period) के लिए खोला जाएगा, जिसमें कई महीने लग सकते हैं। इसके बाद यदि सरकार इसे फाइनल नियम के रूप में अधिसूचित करती है, तो अमेरिकी बिजनेस ग्रुप्स और टेक इंडस्ट्री द्वारा इसे दोबारा अदालतों में चुनौती दिए जाने की पूरी संभावना है। इसलिए वर्तमान में चल रहे वीजा स्टेटस पर तुरंत कोई घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन भविष्य में नई H-1B भर्तियों को लेकर अनिश्चितता जरूर बढ़ गई है।
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